लोग कहते है ...आज की युवा पीढ़ी को प्यार का मतलब ही नही पता... शायद ये लोग जो कह रहे है ये सच है।
आज अचानक याद आ गई अपने नाना-नानी की ज़िन्दगी में उनके उलझने बहुत थी ,बड़ा सा परिवार तीन बेटे दो बेटियां, सबकी शादी करना फिर उनके बच्चे। उस बीच नाना का कमाने जाना और नानी का सबके साथ मिल बाट कर पुरे घर को संभालना , सबमे प्रेम बना रहे इसका ख़याल रखना,.......परिवार की इन ज़िम्मेदारियों को सँभालते-सँभालते क्या नाना-नानी एक दूसरे को भूल गए थे....ऐसा तो कुछ भी नही होता था....जहा तक मुझे याद है । नानी दिन में दो बार सुबह और शाम श्रृंगार करती थी साडी बदलती थी, शाम को जुड़ा छोटी बनती थी, और नाना के आने का इंतज़ार करती थी। वही दूसरी तरफ नाना .....उनका बस एक ही काम होता था , कही भी जाने से पहले वो नानी से मिलके जाते थे और हर बार कहते थे"अभी आते है" नानी शर्मा कर अंदर आ जाती थी। ये सब मुझे इसलिए भी याद है क्योंकि काफी बड़े होने तक मैंने नाना और नानी को देखा है । एक वो दौर था एक ये दौर है जहा मैं अपने मम्मी-पापा को देखती हु । मेरी मम्मी नानी को देख कर शाम को तैयार हो कर पापा का इंतज़ार करना तो सीख गई और ये भी सीख गई की प्यार कैसे देखाया जाता है पर पिताजी ने नाना से कुछ न सीखा। वो तो मस्त रहते है बस उनके प्यार का मतलब है चार लोगो के सामने मम्मी को उनके घर और दिल की मालकीन साबित कर देना ।इसे प्यार का दूसरा पड़ाव भी कह सकते है जहा वो पुरे समाज के सामने मम्मी को अपनी मालकीन कहने का दम रखते है ।और तो जो नोक-झोक होती है .....जब पापा किचन में जा कर मम्मी को खाना बनाना सीखने लगते है और मम्मी उन्हें बाहर का रास्ता देखा देती है । ये तो प्यारी से झलकिया है ....अब आती है बारी एक और दौर की । दीदी-जीजा जी की इनकी शादी में जब दीदी वरमाला लेके स्टेज पे आने वाली थी तो जीजा जी अपने दोस्तों को धक्का देके उनके पास पहुच गए थे और उनका हाथ थाम के स्टेज पर ले आए थे ।सबने उनके इस कदम को बड़ा सराहा फिर जब वरमाला डाली तब दीदी को एक किस भी दे दिया वही स्टेज पर अबकी कुछ लोगो ने सराहा 'बड़ा प्यार है दोनों में , इनदोनो को नज़र न लगे' ।
अब अगर इन तीनो परिस्तिथयो का आकलन करे तो नानी नाना एक दूसरे का नाम नही लेते थे (ऐ जी ओ जी से काम चलाते थे)। मम्मी पापा ने भी एक दूसरे का नाम नही लिया (मम्मी पापा को गुप्ता जी बुलाती है और पापा मम्मी को सुनिए जी कह देत है) । .....दीदी जीजा जी एक दूसरे का नाम लेते है । देखा जाए तो सबमे अलग तरह का प्यार है मिठास है सबने अपने रिश्ते की एक परिभाषा गढ़ रखी है ,जिसे सिर्फ वही दोनों समझ सकते है । अब सोचने वाली बात तो ये है की यहाँ तक तो ठीक है अब आगे आने वाली पीढ़ी कौनसी नयी परिभाषा को जन्म देगी ।
काश! हम ये चुन पाते की हमे कौन से अदवती ज़माने से ताल्लुख रखना है। हमे नही चाहिए कोई दिखावे वाला ठप्पा ।हमे तो बस एक दूसरे के लिए अपना प्यार ,साथ और समर्पण साबित करना है। जैसे कठिन परिस्थिति में नाना नानी करते थे। एक दूसरे का सम्मान कर के मम्मी पापा करते है .....समाज में एक दूसरे का मान दीदी और जीजा जी रखते है।हमे सबसे कुछ न कुछ सीखना है तब कोई नही कहेगा की हमे प्यार करना नही आता । और अपना भी तो एक अफ़साना लिखना है तभी तो आगे आने वाले हमसे कुछ सीखेंगे , फिर चाहे वो ऑफिस से थक के वापस आने पर भी उनकी पसंद का खाना बनाना हो या उनका घर आते वक़्त एक मोगरे का गजरा ही ले आना हो।.....एक अफ़साना याद है न.....
Monday, 1 June 2015
अदावतो का ज़माना (तब से अब)
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