Friday, 18 December 2015

Feeling 99% downloading

जब-जब 99% डाउनलोडिंग का दृश्य देखने को मिलता है तब-तब दिल की धड़कने किसी इलेक्ट्रिक इंजन वाली रेलगाड़ी से भी तेज़ भागने  लगती है। ऐसा लगता है जैसे मिस्बाह-उल-हक़ बैटिंग पे खड़ा है,उसे सिर्फ 4 रन चाहिए आखिरी बाल है और बोलिंग जोगिन्दर कर रहा है(ये उपमा उन लोगो के लिए दी है जो 99% डाउनलोडिंग के डर से कभी नही गुज़रे.......!) जनाब ऐसे ही हालात होते है, जब दिल सीने में नही मुह तक आ कर धड़कता है।वैसे इस समस्या की एक अच्छी बात होती है,ऐसे हालातो का सामना आपको सिर्फ 1 या 2 मिनट के लिए ही करना पड़ता है फिर या तो छक्का पड़ता है या बल्लेबाज़ आउट हो जाता है मतलब फ़ाइल 100% डाउनलोड हो जाती है या फिर error लिख के आ जाता है। ख़ुशी इस बात की है की हर बार भगवान् इतना दयावान हो ही जाता है की दिल का दौरा पड़ने से पहले एक पडला भारी कर देता है।
              आज मेरे दिमाग में ये ख़याल इसलिए आया क्योंकि मैं आपको नही बताना चाहती की मैं भी इन्ही हालातो से गुज़र रही हूँ । अब ये मैं बिलकुल नही बताउंगी की मैं इतनी बुरी तरह से ग्रसित हूँ की मेरा ये समय 1 या 2 मिनट का नही बल्कि 4-5 दिन लम्बा खिच गया है पर उम्मीद के आलावा मेरे पास कोई चारा नही, ऐसे नही है की मैं इंसान ही असामर्थ्यवान हूँ लेकिन मुझे ये दिन काटने ही पड़ेंगे । बिना किसी गंभीर चर्चा का विषय बने मैंने अपना ध्यान एक कथन पर केंद्रित किया जिसमे भगवान् श्री कृष्णा कहते है ' इस दुनिया में जो भी होता है वो मेरी ही मर्ज़ी से होता है' मतलब मेरे साथ भी जो हो रहा है उसमे श्री कृष्णा की मर्ज़ी हुई अब पता नही भगवान् जो करता है वो क्या समझ के करता है। ये कथन मुझे सांत्वना देने के लिए काफी ही था की श्री राम भगवान् से देखा न गया उन्होंने रामायण में कह डाला 'हर एक कार्य के निष्पादन(सक्रियता) या निष्क्रियता के लिए मनुष्य  द्वारा ईश्वर को दोषी ठहराना समस्त मनुष्य जाती के लिए धिक्कार(लानत) के समान है'  समस्त मनुष्य जाती पर लानत बनने  से अच्छा है की अपने साथ जो कुछ भी होता आ रहा है उसकी ज़िम्मेदारी मैं खुद ही ले लू  तो बेहतर होगा । बस एक ये ही कामना है की ऐसी फीलिंग के साथ किसी को 4-5 दिन न गुज़ारने पड़े । अब फिलहाल मैं आश्वस्त हूँ।

Friday, 20 November 2015

हाँ! मैं हूँ स्वार्थी


क्या यार स्वार्थी शब्द के अर्थ का अनर्थ कर रखा है दुनिया ने.....इतने विद्वान् आए पर कोई इस अनर्थ का अर्थ नही बना पाया..... लोग कहते है स्वार्थी होना बुरी बात है.......मुझे भी बचपन से यही कहा गया है , पर मैं हूँ स्वार्थी और रहूंगी - अच्छा रहेगा अगर आप भी मुझसे स्वार्थी बन कर बात करे और मुझे भी वही समझे......अरे मुझे तो स्वार्थी लोग ही पसंद है,क्योंकि स्वार्थी शब्द का मतलब है जो सिर्फ खुद से मतलब रखता हो,जिसे सिर्फ अपनी पड़ी हो.....तो इसमें बुराई क्या है। अब मेरा ही उदाहरण ले लीजिये , मैं एक पत्रकार बनना चाहती हूँ , मैं इस समाज से बुराई को ख़त्म करना चाहती हूँ ,क्योंकि मैं खुद इसी समाज में रहती हूँ, तो इसको कैसे गन्दा रहने दूँ, अब हुई न मैं स्वार्थी.....
जब कोई अपने माँ-बाप की सेवा करता है, तो वो उनसे आशीर्वाद पाना चाहता है, अब वो इंसान भी तो स्वार्थी ही हुआ। असल में हमे स्वार्थियों की ही ज़रूरत है, जो इस समाज को दुनिया को अपना समझे और पुरे स्वार्थ के साथ खुद को इसका हिस्सा समझ कर सुधार करे। मसलन जब कोई व्यक्ति किसी और से प्यार करता है ,उस वक़्त वो भी स्वार्थी ही होता है। आप अपने प्यार के साथ समय बिताना चाहते है क्योंकि जब वो व्यक्ति आपकी नज़रो के सामने होता है तो आप खुश होते है। आप उनको परेशान नही करते क्योंकि उनको परेशान देख आप भी असहज हो जाते है ,तो हुए न आप भी स्वार्थी....
क्या बुराई है इस शब्द में 
'ये दुनिया मेरी, ये समाज मेरा
ये सरकार मेरी, तो ये सरोकार भी मेरा'
जिस दिन हर एक व्यक्ति ऐसा 'स्वार्थी' बन जाए। उस दिन ये दुनिया कई लांछनों से बच जाएगी।
इस बात में कोई दो राय नही है की कुछ बुरे स्वार्थी होते है,तो कुछ भले... जैसे सिक्के के दो पहलु होते है वैसे हर चीज़ की दो किस्मे होती है। ये बताने की बिलकुल ज़रूरत नही है की किस किस्म के स्वार्थियों की ज़रूरत है इस दुनिया को। जैसे दुनिया के लोग निस्वार्थ भाव की बात करते है...वो तो बिलकुल जायज़ नही है,क्योंकि अगर एक इंसान अपने कार्य से प्यार नही करेगा  तात्पर्य उसे लेकर स्वार्थी नही होगा,तब तक पुरे मन से काम नही करेगा। तनमयता तभी आएगी जब स्वार्थ होगा,तो स्वार्थी बनिये इस दुनिया के लिए और गर्व से कहिये  'हाँ मैं हूँ स्वार्थी'।
जय हिन्द।

Thursday, 19 November 2015

पंचायती मेट्रो


कोई बड़ा शहर हो या छोटा शहर मेट्रो की रट सब जगह ही लग रही है। हर शहर अपने-अपने ट्रैफिक से इतना परेशान है की मेट्रो की फैन मचाए बैठा है, ऐसे में सरकारे भी सोच रही है इस हल्ले को कम करने के लिए मेट्रो नाम की चुसनी शहरवासियों के मुँह में ठूस के रखो । कभी न कभी मेट्रो आ ही जाएगी इस ख्याल से सब खुश है।
         अच्छा मैंने ये सुना है , मेट्रो का पहला डब्बा महिलाओ के लिए आरक्षित होता है, तो वहा खूब बातें होती होंगी और नए-नए किस्से भी सुनने को मिलते होंगे। इस उम्मीद में मैं जब दिल्ली गई ,महिला डिब्बे में सफ़र करने की सोची और अपने दांत चिंयार के डब्बे के अंदर पहुच भी गए.......पर वहा का समीकरण तो बिलकुल ही उल्टा निकला , न तो कोई आपस में बातचीत करता है, न ही एक दूसरे को कोई भली तरह देखता ही है, अगर किसी से नज़रे मिल जाए तो मुस्कुराना भी कोई उचित नही समझता, ऐसे हालात और लेडीज डिब्बे के। बड़ी निराश हुई ....हमे तो लगा था जैसे पहले के समय में सर्दियो की दोपहर को धुप खाने के लिए औरते छतों पे या अपने घर के  द्वारे  पे खटाई डाल के बैठ करती थी, अचार की खाने की रेसिपी  एक दूसरे को बताया करती थी, ऊन की सिलाई से बातो का स्वेटर बुना करती थी,महंगाई की उलझनों से मटर छिला करती थी, सब्जिया काटी जाती थी, पूजा पाठ की तिथि, गाना बजाना, मूंगफली खाना ये सब हुआ करता था, वैसा ही कुछ मेट्रो के लेडीज डब्बे में होता होगा, पर यहाँ तो किसीको मुस्कुराने तक का भी समय नही है।
वो ज़माना तो अब का युवा वर्ग न देख सका  पर अब लगता है ये पंचायती चौपाल इतिहास बनकर रह जाएगी शायद मेट्रो का सफ़र काफी छोटा है इतना छोटा की अचार तो छोड़ो इतने में हल्दी भी न पक पाए ।
शायद दिल्ली बहुत बड़ा शहर है , जब मेट्रो किसी छोटे शहर आएगी,तब देखते है कितनी कहानिया बनेगी ,कितने सीरियल या उनकी कहानियो की चर्चा हुआ करेगी, अपनी अपनी जीवन समस्याए और उनका निवारण मिला करेगा , या ये सब न भी हो तो कमसे कम एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने की प्रथा तो चलेगी ही चलेगी ये रिवायत तो कोई नही छीन सकता।  जय हिन्द।

Saturday, 10 October 2015

लखनऊ को समझने की एक कोशिश

इतने सालो से गहन अध्यन चला कई फैसले आए गए पर आज भी इस सवाल का जवाब नही मिल पाया की आखिर लखनऊ के और शेहरो से अलग होने का कारण क्या है? अब तो मेट्रो भी आने वाली है,प्रदेश सरकार ने काफी तेज़ी भी दिखा दी है ,इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम जैसे कई चीज़ों की सौगात देकर लखनऊ को ताकतवर बना दिया पर वही बात है न लखनऊ बहुत समय पहले से प्रदेश की राजधानी रहा है इसका मतलब हर नई योजना की सौगात का स्वाद सबसे पहले लखनऊ वाले चटोरे ही चखते आ रहे है और हम भी हर नज़राने(तोहफे) को और प्रदेशो की राजधानियों की तरह स्वीकार  करते आ रहे है पर फिर भी हम अलग क्यों है?
अजब जीवन है भाई यहाँ का कहने को तो एक शहर है लखनऊ पर लोग एक जगह ठहरते भी है । कई कार्निवाल मेले भी जाते है(आपस में मिलते जुलते भी है)  इस चमक दमक के पर शांति भी है। अब यहाँ भगवान् द्वारा कोई वरदान तो प्राप्त नही है की हम शहरवासी भी हो और खुश भी ?तो फिर ये हो कैसे रहा है और तो और मज़ाक-मज़ाक में एक सर्वे रिपोर्ट हाथ लगी उसमे ये कहा गया की पुरे दर्श में सबसे खुश रहने वाला दूसरा शहर है लखनऊ। मेरे मन में सवाल यही से उठा हुआ है की आखिर कैसे ?क्या फर्क पड़ता है ?बस वो दिन है और आज का दिन है,मैंने अपने रोज़मर्रा के कामो के साथ-साथ इस अध्यन को भी जोड़ लिया। अरे! वही पता लगाने का की लखनऊ शहर होने के बावजूद इतना खुश और अच्छा कैसे है ? तो मेरा सफ़र शुरू हुआ दुबग्गा ,चौक, घंटाघर ,बड़ा इमामबाड़ा, हज़रतगंज, अमीनाबाद, कैसरबाग, गोमतीनगर, अलीगंज,बुद्धेश्वर, आलमबाग इन सभी जगह पर मौका पड़ते ही अध्यन शुरू किया और हर बार मुझे एक ही जवाब मिला और वो है 'फुरसती'
ये शहर किसी भी बड़े शहर की तरह चलता फिरता है यहाँ नाईट लाइफ है तो बहुत सारे रोज़गार के मौके भी ,पढाई लिखाई का भी स्तर काफी हद तक संभल गया है, और जगह के युवाओ ने भी लखनऊ का रुख किया है ,सफाई भी रहने लगी है,काम काज में तेज़ी भी आई है और तो और अपने मुख्यमंत्री साहब भी तो 40 साल के युवा है बस पार्टी ही थोड़ी उम्रदराज़ है | यहाँ जोश है जुनून है खाना है नवाज़गी है शायर है उनकी शायरी है पर इन सब पर भरी है 'फुरसती' वो ऐसे की जबसे गोमती नदी की सफाई का अभियान चला है तबसे पक्के पुल पे आए दिन साइकिल वाले,बाइक वाले, कभी-कभी कार वाले रुक-रुक के बड़ी फुरसत के साथ 10/- की मूंगफली खरीदते है और खड़े-खड़े सफाई अभियान का काम देखते हुए मज़े लेते है । ऐसे में लखनऊ का बिज़नेस भी चमकता है ।पहले तो पुल पे सिर्फ मूंगफली बिकती थी अब चाय भी बिकने लगी है । मैं तो सोच रही हूँ क्यों ना दो-चार को आईडिया देकर शहर का थोडा सा स्टैण्डर्ड बढ़ाते है और मूंगफली चाय के साथ पॉपकॉर्न भी बिक्वाते है।
अगर आपको ऐसा लग रहा है की ये काम सिर्फ दो-चार लफंदर,लपाड लड़को का है तो ऐसा नही है ,वहा कई लडकिया, महिलाए ,बूढ़े, जवान ,बच्चे सब आते है और टाइम पास करते है।
चूँकि ये फुरसती का कीड़ा पुरे शहर में रेंग चूका है तो इससे पर्यटक भी कैसे अछूते रह सकते है, उन्हें भी फुरसती की लत लगती है और सैलानी होने के नाते वो तो 20/- की मूंगफली ले बैठते है।
मेरे द्वारा किये गए एक और अध्यन ने ये भी बताया है की फुरसती जन्म देती है 'टोक' को जो हम युवाओ को फैशन करते समय बहुत झेलना पडता है। अब समय होगा तभी तो इंसान ध्यान देगा और ध्यान देगा तो अजीबो-गरीब फैशन पर टोकेगा भी ,मसलन कैटी आईज़ फ्रेम वाले चश्मे का फैशन लखनऊ में अब आया है जबकी सोनम कपूर इस चश्मे को पहन कर आइशा मूवी करके पीट भी चुकी है।हर ट्रेंड को यहाँ आने में समय लगता है जैसे ट्रेंड भी अपने आपमें  ये सोचता हो 'अमा जब फुरसत में आएँगे तब लखनऊ जाएंगे अभी बाकि के देश को कवर करो'।
वैसे इस फुरसत से याद आया हद होगई यार मुझे भी कितनी ज़्यादा फुरसत है।एक फालतू से सवाल के जवाब के लिए मैंने पुरे शहर का चककर लगाया ,लोगो को ताड़ा ,जगह-जगह की चाय पी मारी और जवाब मिला तो क्या फुरसत ! हद है यार न तो हम रिसर्च करने आए है न ही हमे इस काम के पैसे मिलने थे। तो हमने ये काम किया क्यों ? और आपलोगो की फुरसत का तो जवाब ही नही बस पढ़े जा रहे है लगता है लखनऊ का फुरसती कीड़ा मेरे कलम से आपके ज़ेहन में घुसता जा रहा है । जहा इतनी फुरसत मिली है वह थोड़ी और सही, समय निकालिये और आइये कभी पक्के पुल पे गोमती नदी की सफाई देखने ;)

Sunday, 6 September 2015

आपको पता था क्या!!

बचपन से कोई बच्चा खेलने में अच्छा रहा हो तो  ऐसी कवायदें लगाई जाती है की उसने फुटबॉल और क्रिकेट ज़रूर खेल होगा, पर मैं अगर अपनी बात करू तो मैंने वॉलीबाल ज़्यादा खेला है, आखिर 2-4 लोगो की ज़रूरत होती है,जगह भी छोटी हो तो चलता है ,खेलना भी आसान होता है और करना क्या है सिर्फ पैर से बॉल को नही छूना है। हाथो का ही इस्तेमाल करना है।
जैसे क्रिकेट के कानूनों को तोड़ कर हम बच्चों ने गली क्रिकेट ईजाद किया।वैसे ही वॉलीबॉल को पैर से खेल कर हमारी टीम को बड़ी ख़ुशी हुई,की नया गेम हमने बनाया है। ये तो कल पता चला की जो खेल हुमलोग बचपन में खेल कर खुश थे असल में वो 15 वीं सदी से चला आ रहा है मतलब क्रिकेट से भी पहले से , असल में इस खेल का नाम है SEPAK TAKRAW ये एक मिक्स्ड जेंडर गेम भी है।ये अपने नाम के अनुसार है। दक्षिण-पूर्व एशियाइ भाषा में Sepak का मतलब kick होता है और TAKRAW का मतलब woven ball । ये खेल पूरी दुनिया में 120 देश खेलते है जिनमे से ज़्यादातर देश यूरोप, अमेरिकन, अफ्रीकन ,एशियाई, मिडिल ईस्ट, सेंट्रल, ईस्ट और ओशिनिया  से है।मतलब जितने देश अन्तराष्ट्रीय खेल फूटबाल और क्रिकेट नही खेलते वो सब भी sepak TAKRAW खेलते है। अब आधी दुनिया ये गेम खेलती है तो एक फेडरेशन भी होनी चाहिए। ISAF (INTERNATIONAL SEPAK TAKRAW FEDERATION) हर साल सुपर सीरीज,वर्ल्ड कप, किंग्सकप एशियाई गेम्स, साउथ ईस्ट एशियाई गेम्स का आयोजन करवाती है।
इसमें 2 टीमे होती है जिन्हें 'regus' नाम से भी  जाना जाता है। हर टीम में 3 खिलाडी होते है ,जिनमे से 2 नेट के पास और 1 नेट से दूर सेंटर पर खड़े रहते है। इसमें 21-21 के 3 सेट होते है। जो पहले 21 स्कोर कर लेता है वो 1 सेट जीत जाता है और जो ऐसे ही 2 सेट जीतता है वो गेम जीत जाता है।इसमें पैर,घुटना,और सीने से बॉल को छूने की आज़ादी होती है। ये खेल rattan बॉल से खेल जाता है।
ये तो हुई इस खेल की अब तक की जानकारी ,पर क्या आपको पता है मुझे अचानक इसकी याद क्यों आई, न तो पेपर में इसकी कोई खबर है ,न ही न्यूज़ चैनल पे। मुझे इंटरनेट से पता चला है की international de france de sepak takraw आजकल चल रहा है। अपनी टीम इंडिया ने इसमें ब्रोंज मैडल पक्का कर लिया है। स्टेनबॉर्ग में चल रही इस प्रतियोगिता में हम अभी तक अजय है....... हमने फ्रांस,जर्मनी,थाईलैंड और ईरान जैसी बड़ी-बड़ी टीमो को हरा कर अपनी जगह पक्की की है।
ऐसा नही है की इस खेल को कोई देश शौक से देखता नही है। साउथ-ईस्ट एशिया में तो लोगो का धर्म है ये खेल जैसे हमारे लिए क्रिकेट  और फ्रांस में तो हर एक प्रतियोगिता के टिकट ज़ोरो से बिक गए, ऐसे में खचा-खच भरे स्टेडियम में इस खेल को पुरे जज़्बे के साथ हूटिंग ,स्लेजिंग को नज़र अंदाज़ कर हर बार अपनी टीम इंडिया ने विजय हासिल की और जिन टीमो को समर्थन 100%  दर्शक का रहा उन्हें हरा कर  हमे गौरान्वित किया। अब बताइये क्या ऐसे खिलाडीयो को हमारे देशवासियो की तरफ से शाबाशी नही मिलनी चाहिए.......? हम तो इस खेल के बारे में भी नही जानते है और हमारे खिलाडीयो ने फ्रांस जा कर सबकी नाक में दम कर रखा है। मुझे लगता है न्यूज़ पेपर का एक कोना या न्यूज़ चैनल की एक हैडलाइन तो इन्हें मिल ही सकती है, पर किसे फुरसत है। ख़ैर....... मुझे गर्व है अपनी sepak takraw की इंडियन टीम पे।
       शाबाश टीम इंडिया!

Friday, 14 August 2015

मेरा धर्म मेरी आज़ादी

दुनियाँ ,देश, धर्म ,जाति सबसे एक मत बटा हुआ इंसान, विश्व स्तर पर धर्म जाति को लेकर इतने मत नही है जितने हमारे राष्ट्र भारत में है। कहते है भारत एक ऐसा देश है जिसमे हर धर्म को बढ़ावा मिलता है। हिन्दू धर्म की उत्पत्ति भी यही बताई जाती है क्योंकि सनातन धर्म के अवतार कहे जाने वाले राम और कृष्ण का जन्म यही हुआ था। शायद इसलिए यहाँ हिन्दू धर्म को ज़्यादा आंकते है परन्तु दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी मस्जिद केरल में 600 B.C में एक हिन्दू राजा के द्वारा बनवाई गई थी। ये बात बहुत कम लोग जानते है क्योंकि उसका रख रखाव भी नही किया गया। इसके अलावा भारत देश में कुल 3,00,000 मस्जिदे है जो दुनिया के किसी और देश में नही है और मुसलमानो की सबसे ज्यादा खुश रहने की तादात भी भारत में ही है। इसलिए इस्लाम को दूसरा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है। ऐसे ही दो धर्म और है जैन धर्म और बोद्ध धर्म जिनकी उत्पत्ति या बढ़ावे में भारत देश को सबसे अहम् मानते है। मानना चाहिए भी हम यूँ ही तो नही है प्रजातंत्र हमने अपने देश को धर्म से जोड़ा है, हमने  हर रंग को रौशनी को पनाह दी है, दिलो में प्यार भरा है इसलिए हम अनोखे है।
   जहा एक तरफ विश्व में धर्म से आज़ादी जैसे मुद्दों पर बात चल रही है । ऐसे में दुनिया धर्मकांडो में निपुण भारत का नजरिया एवं पक्ष जानने को उत्सुक है कि क्या धर्म से आज़ादी मिलनी चाहिए? हमारा देश चारो तरफ से धर्म से जुड़ा हुआ है और तो और कभी-कभी यहाँ के न्यायधीश भी आस्था का हवाला दे कर फैसला सुना देते है। ऐसे देश या देशवासियो से धर्म से आज़ादी वाले मसले पर टिप्पणी लेना न खां में होगा न खामखाँ में इसलिए इतिहास के पन्नों को पलट कर इस सोच की उत्पत्ति के बारे में जानकारी देने की कोशिश करते है की आखिर ये मसला है क्या?
18 वी सदी फ्रांस की क्रांति के समय पहली बार धर्म से आज़ादी के मसले ने लोगो का ध्यान अपनी तरफ खीचा था। धर्म से आज़ादी का मतलब आप यानी आम जनता में से कोई भी कभी भी अपने धर्म को छोड़ सकता है लेकिन उसे कोई और धर्म को अपनाने की ज़रूरत नही है वो बिना किसी धर्म के जीवित वह सम्मानित व्यक्ति की तरह अपना जीवन निर्वाह कर सकता है। ऐसे लोगो का मानना होता है की दुनिया में कोई भगवान् देवता या दैवीय शक्ति नही होती , वो किसी को पूजनीय नही मानते। ऐसे लोगो को अक्सर नास्तिक बोलते है ।
बड़ी ही मज़ेदार बात है पर किसी भी धर्म या भगवान् में न मानने वाला भी एक धर्म इस दुनिया में प्रचलित है और वो है बौद्ध धर्म यहाँ न तो कोई भगवान् है न ही कोई देवता इसकी उत्पत्ति करने वाले कर्ता-धर्ता ने लोगो से उनके साथ जुड़ने को कहा । कही न कही वो सबको धर्म से आज़ाद ही कर रहे थे , पर ये काम करते-करते वो खुद इतने महान होगए की उनके ही लोगो ने उन्हें अपना भगवान बना लिया। ऐसे में एक ख़याल दिमाग में आता है "कभी भी किसी से उसका धर्म मत छीनो वरना लोग तुम्हे अपना धर्म बना देंगे" ।
दुनिया में धर्म से आज़ाद लोगो की संख्या पता लगा पाना तो मुश्किल है पर गल्लोप इंटरनेशनल ने एक सर्वे रिपोर्ट जारी कर ये बताया है की 2015 में 64,000 लोगो पर किया गया एक टेस्ट में 11% लोग नास्तिक बनने के लिए मान गए , 2012 में 13% लोग माने थे । इस वक़्त 8% जनसँख्या नास्तिक लोगो की पूरी दुनिया में मानी गई है।जिनमे से सबसे ज़्यादा यूरोप और पूर्व एशिया में पाए जाते है मसलन सबसे ज़्यादा लोग वहा धर्म से आज़ादी का समर्थन कर रहे है। चीन भी इस मुद्दे से अलग नही है वहा भी बढ़ चढ़ कर धर्म से आज़ादी ले रहे है। इन आकड़ो के अलावा आस्तिक लोगो की एक मान्यता भी सामने आई है पुरे यूरोप में 20%  हर धर्म के लोग भगवान् को नही मानते ।
इस मसले से कार्ल मार्क्स भी अछूते नही है उन्होंने धर्म पर टिप्पणी कुछ इस तरह की "धर्म ह्रदय रहित दुनिया का ह्रदय है और आत्मा रहित दुनिया की आत्मा है" ।
मेरा धर्म मेरी आज़ादी एक सोच है जिसके बारे में इस देश के नागरिको को कोई ख़ास जानकारी नही है परन्तु आज की दुनिया का ये एक अहम् हिस्सा है जिससे हमे रु-ब-रु होना ही पड़ेगा। एक हिन्दू,मुसलमान,सिख या ईसाई होने की वजह से आपको धर्म से आज़ादी पर सोचने में मुश्किल हो सकती है पर एक इंसान बनकर सोचने से एक रास्ता मिल सकता है।
हमारे भारत देश का संविधान हमे धर्म चुनने की आज़ादी तो देता है पर धर्म से आज़ादी नही देता। कहा 18 वी सदी में यूरोप में ये मसला उठ गया कहा 2015 में 69 वी वर्षगांठ पर हमे इसकी या ऐसी सोच की जानकारी देनी पड़ रही है। फर्क को समझिये।
जय हिन्द ।

Monday, 20 July 2015

फुटबॉल के देसी जादूगर.....

आजादी एक ऐसा शब्द है जिसको पाने के लिए हमारे लोगो ने कितना खून बहाया । बात करीब 1940-1950 के बीच की है जब हमे आज़ादी मिलने के आसार बने और 1947 में आज़ादी मिल भी गई। हम आज भी कुछ गिने चुने नेताओ को जानते है जो हमारे दिलो में एक अलग ही इज़्ज़त रखते है। शायद सिर्फ इतना ही जानते है हम आज़ादी के बारे में क्योंकि हमारी किताबो ने इतना ही बताया है पर आज आप एक नया किस्सा सुनेगे जो आज़ाद भारत का है पर किसी किताब में शामिल नही है और इसका रिश्ता आज़ादी से भी नही है।
बात है 1948 समर ओलंपिक्स की जब वर्ल्ड वॉर  दो के सदमे को झेल चुकी दुनिया ने एक बार फिर 12 साल बाद ओलंपिक्स करवा कर खेल को दोस्ती का रास्ता बनाया । उस वक़्त नए -नए जन्मे हिन्दुस्तान ने भी अपनी साख एक आज़ाद देश  के तौर पर बनाने की सोची। AIFF (All India Football Federation) का निर्माण कर फीफा से सदस्यता लेने का आग्रह किया। फीफा ने हमे 79th सदस्य घोषित कर समर ओलंपिक्स के लिए हरी झंडी दिखा दी। फेडरेशन बन गई थी पर ज़रूरत थी टीम की । हॉकी और बाकि खेलो में तो हम तबसे मश्हूर थे, जब आज़ाद भी नही थे । तबसे ध्यान चन्द जैसे खिलाडी भी साथ थे, पर फुटबॉल का ध्यानचंद ढूंढ पाना आसान नही था। यूरोप की तरह 19 वीं शताब्दी में फुटबॉल का परिचय हिंदुस्तान से हो चूका था  इसलिए इस खेल के लिए खिलाडी ढूंढना  कोई मुश्किल काम न था । आखिर अंग्रेज़ एक ये भी अच्छा काम कर गए , हमे क्रिकेट तो सीखा ही दिया  साथ-साथ फुटबॉल का भी चस्का चढ़ा गए।
AIFF ने पूरी टीम को इकठा किया और लंदन रवाना कर दिया। वहा पहुच कर हमने 5 वार्मअप मैच लोकल टीम से  खेले ।
Department Store Xl , Metropolitan Police FC , Hayes FC , Alexander Park FC , Pinnes FC  कुल मिलाकर भारतीय टीम ने 39 गोल किये और सिर्फ 5 ही गोल हमारे खिलाफ हुए। हमारा  खुद पर भरोसा भी सातवे आसमान पर पहुच गया । उस वक़्त हम अपनी फ़िज़ा बना रहे थे । वहा के अखबारो में हिन्दुस्तानी टीम का नाम छपा पड़ा था। सबको लग रहा था की पहली बार अन्तराष्ट्री मैच खेल रही टीम इंडिया इतनी हलकी भी नही है , पर सबसे बड़ी खबर ये नही थी। सबसे बड़ी खबर उस दिन बनी जब पहला मैच इंडिया का फ्रांस के साथ पड़ा। फीफा के नियमो के मुताबिक हर टीम को जूते पहन के खेलना होगा। हमारे पास पैसो की कमी नही थी , पर हमारी टीम ने बिना जूतो के फुटबॉल हमेशा से खेला था । ऐसे में अचानक जूते पेहेन के अंतराष्ट्रीय मैच खेलना हमारी टीम के लिए अजीब था क्योंकि जिसने कभी फुटबॉल जूते पहन के न खेला हो वो अपने ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मैच जूतो के साथ कैसे खेल सकते है, ये काफी मुश्किल था पर फीफा के नियमो के चलते 3 खिलाडीयो ने जूते पहन कर खेलने का आग्रह स्वीकार लिया और बचे हुए 8 खिलाडीयो ने पैरो पर गरम पट्टी  बांध कर नियमो का सम्मान किया। उस समय भारतीय खिलाडी लंदन के मोहोल के आदी भी नही थे। लंदन में गुलाबी ठण्ड में नंगे पैर गीली घास पे फुटबॉल खेलना बहुत मुश्किल था। किसी तरह विवाद ख़त्म  हो मैच शुरू हुआ । ये मैच ईफोर्ड पूर्वी लंदन के एक कसबे में हुआ। हमारी टीम फार्मेशन कुछ इस तरह थी।
Goalkeeper-Varadaraj K.V
Defence- Shailendra Manna & Taj MD
Mid-fielders- Basheer , A.S Talimraan (captain) , Mahabir Prasad
Forward- Rabi Das , B.Pareb Maha Chandra , Sahu Mewalal , Ahmad Khan , Sarangapani Raman
2:3:5 यही फार्मेशन फ्रांस का भी था। दर्शक दीर्घा में खेल का उत्साह ही अलग था। कुछ का मानना था की हिन्दुस्तानी  नौसिखिये है तो कुछ हमारा पूर्व प्रदर्शन लोकल टीमो के खिलाफ देख कर दंग थे क्योंकि ये मैच शूज़ v/s नॉन-शूज़ का भी था। पहले 30 मिनट के हाफ में फ्रांस ने एक गोल कर दिया था।दूसरे हाफ में इंडिया के तरफ से आक्रमण कर सारंग और मन्ना ने साझेधारि में एक गोल कर बराबरी हासिल कर ली क्योंकि जब खोने को कुछ न हो तो इंसान बहुत खतरनाक हो जाता है। इसके बाद तो इंडिया ने वो खेल दिखाया जिसको देख दर्शक भी अपनी टीम को भूल गए । इंडिया को दो पेनाल्टी मिली हमारे सबसे अच्छे खिलाड़ी ने पहला शूट लिया  पर वो चूक गए  क्योंकि जूतो में शूट लेने की आदत नही थी दूसरा शूट लेने से उन्होंने मना कर दिया इत्तफाकन दूसरा शूट भी गोल में तब्दील न हुआ। विश्व फुटबॉल इतिहास में इस  घटना को 'regretful' नाम से जाना गया। अंत में मैच को बराबरी पर जाता देख एक्सट्रा समय दिया गया पर हमारे खिलाडी तो सिर्फ 60 मिनट ही खेलने के आदि थे और मैच चला 90 मिनट । ऐसे में फ्रांस हम पर हावी होगया और आखिरी के 120 सेकंड में 1 और गोल कर दिया। बेशक मैच फ्रांस ने जीत पर दिल हिन्दुस्तान ने । हमारा ये खेल देख कर इंग्लैंड के प्रिंस जॉर्ज V। ने पूरी टीम को बंकिंगहम पैलेस  भी बुलाया । ओलंपिक्स के बाद इंडिया जब यूरोप टूर पे आई तब एम्स्टर्डम को 5-1 से हराया और इंग्लैंड से 3 मैच जीते 2 ड्रा कराए ।
ये सफ़र समय के साथ तो ख़त्म हो गया पर इसकी यादे  आज भी बंकिंगहम पैलेस में ज़िंदा है । बिलकुल देसी तरिके से फुटबॉल खेलते हुए फ्रांस से हारने के बावजूद सारी सुर्खिया बटोर ले गए  वो लोग हिन्दुस्तानी खिलाडी ही हो सकते है। शायद हम इन्हें न जानते हो इनका नाम भी न सुना हो पर इनका दिल और दिमाग एक ही बात जनता था और वो था इंडिया । हिन्दुस्तान के लिए जान देने के इलावा हिन्दुस्तान के लिए खेलना भी महान काम है  इसलिए इनको भी उतनी ही इज़्ज़त मिलती थी जितनी की आज़ाद हिन्दुस्तान के सैनिक को मिलती थी। ये हार कर भी बाज़ीगर साबित हुए।

Thursday, 16 July 2015

एक दिन परवाह तो करने दो......

आखिर एक दिन......
एक दिन तो उसे परवाह करने दो
न जाओ कही ,न आओ, कही न करो कोई बात
आखिर एक दिन....
एक दिन तो परवाह करने दो.....

न जवाब दो, न सवाल पूछो, न करो किसी बात का इज़हार
आखिर एक दिन....
एक दिन तो परवाह करने दो.....

लेकिन मैं क्या करू उसे तो तड़पता छोड़ दू की शायद वो मेरी परवाह करे पर खुद का क्या करू

ए दिल......सुन ले!!!!!!!
उसके लिए धड़कना बंद कर.....
जब वो प्यार ही नही करता है!
तू तो जानता है वो खुदगर्ज़ है!
वो लापरवाह है!
उसे तेरी नही खुद की फ़िक्र है!
क्या ये सच जानकार भी तू अपनी इन हरकतों से बाज़ नही आएगा।
!
मुस्कुरा मत......तेरा जवाब मिल गया.....
तो ठीक है मेरी मान और एक दिन बस एक दिन उससे बात मत कर.....अगर जादू होगा तेरी आशिक़ी में.......तेरी तिश्नगी में.....तो एक दिन वो भी तेरी परवाह करेगा.....ये समय जो वो अकेला कटेगा बताएगा की उसे कितनी परवाह है। ये उसके एहसास के लिए कर। उसकी तेरे लिए जवाब देही के लिए कर। बस एक दिन.....
वो ज़रूर आएगा!!!!!?

बात कुछ इतनी सी है की......

जब तुम्हे ऐसा लगे
मेरे बिना अधूरा सा लगे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे

जब तुम्हारे लब खामोश रहने लगे
मेरे बिना समय तुमसे कटता सा लगे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे

जब तुम्हारी आँखे एक टक कुछ देखती रहे
मेरे आगे पीछे तुम्हारा ध्यान लगा सा रहे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे

जब तुम्हे मेरी आदत सी होने लगे
पर मेरा दिल तुमसे डरता सा लगे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे......

Thursday, 2 July 2015

डिजिटल व्याकरण

भारत के डिजिटल होने की शुभकामनाए आप सबको, अब हम सब एक ऐसे देश के वासी हो गए है, जहा सिर्फ गंगा ही नही बहती, बल्कि एक क्लिक पे सारी जानकारी भी मिलती है। एक तो हम सब पहले से ही दुनिया में सबसे ज़्यादा इंटरनेट और स्मार्टफोन इस्तेमाल करते है, ऊपर से अब सारी सरकारी सुविधाए  भी डिजिटाइज्ड हो गई है। इसका श्रेह तो मोदी जी को जाता है पर पूरी तरह से नही, इसमें कोंग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री राजीव गांधी जी भी शामिल है। जो कंप्यूटर और इंटरनेट को हमारे घर तक लाए। उस वक़्त कहा गया था की कंप्यूटर किसानो के बड़े  काम आएगा ,तब सवाल उठा की क्या कंप्यूटर हल भी चलाएगा? तब प्रधानमंत्री जी ने जवाब दिया की वो केवल मौसम की जानकारी देगा, कितनी खाद पड़नी है, कब पड़नी है, कौनसी फसल उगनी है ये सब बताएगा। कहना सत्य था पर कंप्यूटर यहाँ आ कर किसानो के काम न आया कारण अनपढ़ ज़्यादा है इस देश में। किसानो ने कभी ध्यान ही नही दिया , इन सरकारी सुविधाओ का लाभ कभी उन तक नही पहुचा। तब ज़माना और था अब ज़माना और है। इस डिजिटल सप्ताह की शुरुआत पे मोदीजी ने कुछ महत्वपूर्ण घोषणाए की है उनपे एक नज़र डालते है आगे की कहानी बयां करने से पहले।
-डिजिटल लॉकर सिस्टम( जहा आप अपने महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट्स को डिजिटली बदल कर रख सकते है।)
- my.Gov.in (जहा आप सरकारी मसलो पे अपनी राय रख सकते है)
- स्वछ भारत मिशन मोबाइल एप्प
- इ- सिग्नेचर (ITR या व्यापारियो के लिए , आधार से सम्मलित )
- इ- अस्पताल (अपॉइंटमेंट, खून की आवश्यकता पर उपलब्ध होने वह न होने की जानकारी, फीस इत्यादि)
- राष्ट्रिय छात्रवृति पोर्टल
- सभी रिकार्ड्स डिजिटाइज्ड होंगे
- भारत नेट प्रोग्राम
- बीएसएनएल व्हाई-फ़ाई कुछ चिन्हित स्थानो पर
इत्यादि

ये वाकई सराहनीय कदम है पर क्या भारत इसके लिए तैयार है? क्या सच में जो उम्मीद इससे लगाई जा रही है ये उतना कारगर है? या सिर्फ दिखावे की रेस का नंबर 1 घोडा है !
कुछ विशेषज्ञो को ऐसा कहते सुना गया है की अगर सरकार पहले से शुरू कर दी गई योजनाओ को सहेजे  तो भारत किसी भी माइनो में पिछड़ा न रहे, हमे नए योजनाओ की ज़रूरत अभी नही है, बल्कि जो पारित हो चुकी है उनसे अपना आज बेहतर बनाना है। ये नसीहत अच्छी है पर अपने प्रधान सेवक अगर कुछ नया नही करेंगे  तो उन्हें राजीव गांधी जी की तरह याद कैसे रखा जाएगा।
कुछ सवाल अपने प्रधानमंत्री से जो शायद हर भारतीय नागरिक को पूछना चाहिए।
डिजिटल इंडिया का मतलब है की अब डेटा इ-मेल से ट्रान्सफर होगा , तो क्या हमारे ऑफिशल्स इतने 'डिजिटल लिट्रेटे' है की वो .nic.in का इस्तेमाल करेंगे, अपनी जी-मेल आईडी का नही, क्योंकि जी-मेल तो विदेशी कंपनी है। ( कभी.nic.in क्रेश कर गई जो अक्सर कर जाती है ,तब जी-मेल इस्तेमाल किया गया तो हमारा सारा डेटा चाहे डिफेन्स का हो या इकॉनमी का सब विदेशो में काले धन की तरह जमा हो जाएगा)। मान लीजिये की हम इतने लिट्रेटे निकले की .nic.in का  इस्तेमाल  किया, तब हमारी अकलमंदी पर हैकरो की नज़र लग गई तो?  हम तो खोखले हो जाएंगे!
एक घोषणा और की है की ग्राम पंचायतो को भी सर्वर से जोड़ दिया जाएगा , पर आजतक सिर्फ दिल्ली के 50 लाख लोगो को तो जोड़ नही पाए , वो भी साईट क्रैश से परेशान है।
आधार की ज़रूरत को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कीआधार NRI भी बनवा रहे है,वेरिफिकेशन का कोई स्पष्ट तरीका सरकार द्वारा चिन्हित नही किया गया है, रेटिना स्कैन और फिंगरप्रिंट डेटा को पूरी सुरक्षा भी नही दी गई है, इसलिए आधार को बनवाना हर आदमी की मज़बूरी नही है अगर ज़रूरत हो तो बनवाए चाहे ना बनवाए , और आपने आधार को डिजिटल लॉकर और इ-सिग्नेचर से जोड़ दिया।
आप सभी की जानकारी के लिए बता दू की इस डिजिटल इंडिया का कोई 'लीगल होमवर्क' नही किया गया है। डिजिटल सिग्नेचर पहले से पारित है पर 2 साल से कोई नोटिफिकेशन जारी नही की गई है। इसमें कोई सख्ती भी नही है, कॉमर्स इंडस्ट्री पूरी ढील से काम कर रही है । इसमें कोई दोराय नही है की डिजिटल इंडिया से पारदर्शिता बढ़ेगी, नौकरशाही जैसे तमाम कर्को से हम उभरेंगे लेकिन कही ये जल्दबाज़ी में और बड़ा खतरनाक कदम तो साबित नही होगा?  ऐसा न हो की अभी तक हमारे बेहद असंवेदनशील रिकॉर्ड  स्थाई रूप से संकट में थे ,पर अब डिजिटल होते ही इनका इस्तेमाल कोई और न कर ले मसलन ' साइबर क्राइम' जो अभी तक हमारी क़ानूनी समझ में झूल रहा है। इन सभी योजनाओ में बहुत सारी काम की है तो बहुत सारी नाम की ।
फेसबुक, गूगल जैसे साइट्स हिंदुस्तान की रग-रग में बस चुकी है। इनके पास हमारा सारा डेटा है।ये हमे मुफ़्त में अपनी सर्विस दे रही है क्योंकि हम इनके प्रोडक्ट है । ये हमारे बारे में सभी बारीकियो से अवगत है। अब हमे ऐसा कोई कानून लाना चाहिए जो हमारे डेटा ट्रान्सफर करने पर पेनलिटी के नाम पे इनसे वसूला जाए । जैसे यूरोप में हुआ , डेटा ट्रान्सफर का दोषी पाए जाने पर यूरोप गवर्मेंट ने गूगल के टर्नओवर ओवर पर 10% की पेनलिटी लगा दी थी, और  गूगल को भरना पड़ा । यूरोप देश से कोई भी डेटा बाहर ले जाएगा तो उसे जेल हो जाएगी। ऐसे कानूनों की ज़रूरत भी हो गई है क्योंकि डिजिटल इंडिया अब एक उपलब्धि ही नही ज़िम्मेदारी भी बन गया है।
मैकिंसे और फेसबुक की ग्लोबल स्टडी के मुताबिक भारतीय जनसंख्या में 1 बिलियन लोग इंटरनेट इस्तेमाल नही कर रहे है क्योंकि वो देहात में रहते है, अनपढ़ है और उनके आस-पास का माहौल  भी प्रोत्साहित नही करता। ऐसे 37% भारतीय वयस्क है जो अनपढ़ है मतलब 287 मिलियन । अब कही "डिजिटल इंडिया" , "डिजिटल डिवाइड" में न बदल जाए।
जिस तरह एक उम्मीद की किरण हर जगह होती है , वैसे ही यहाँ भी एक खबर आई है महाराष्ट्र के एक गाव में किसान कॉल सेंटर से परेशान होकर किसानो ने एक ' बाली राजा' नाम से व्हाट्सअप ग्रुप बनाया है और उसमे कई खेती विशेषज्ञो को जोड़ा है। अब वहा के किसान अपनी समस्या का समाधान व्हाट्सअप से करते है, क्योंकि ये हिन्दुस्तान है । दुनिया को अचम्भे में डालना हमारा काम है । उम्मीद करते है की हम मतलब हिन्दुस्तान ये फिर से कर के  दिखाएंगे। जय हिन्द।

Wednesday, 24 June 2015

खोता सितारा

मैं मेजर ध्यान चंद की अनुज्ञाई । आज फिर वही पुरानी बात याद आई जिससे मुझे सरकार द्वारा उन्हें नज़र अंदाज़ करना याद आया।एक किस्सा तो आप सबको भी याद होगा जब भारत रत्न देने पर उनसे आगे सचिन(जो की खुद एक महान खिलाडी है) को दिया गया , पर एक किस्सा और है जब दद्दा के ज़िंदा रहते भारत सरकार ने उन्हें भुला दिया था। बात कुछ यु थी वो 51 वर्ष के थे आर्मी से सेवा निवृत हो चुके थे, पैसो  की तंगी थी ,लेकिन हॉकी का जूनून तो बस एक जवान से बढ़ कर था, । उम्र तो ढल चुकी थी पर वो अहमदाबाद पहुच गए एक टूर्नामेंट को देखने , उन्हें लगा शायद यहाँ के लोग उन्हें पहचान जाएंगे और अंदर आने देंगे पर ऐसा नही हुआ ।उन्हें बुरी तरह धक्का देकर स्टेडियम  से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया फिर भी उनकी शालीनता का अंदाजा लगाइये जो उन्होंने इस वाकये के खिलाफ कोई कदम नही उठाया। अगर सरकार भूल गई हो तो उन्हें ये याद दिला दे की ये वही मेजर ध्यान चंद है जिन्हें 'the wizard' नाम से जाना जाता था उनका असल नाम ध्यान सिंह था । वो इतने प्रभावशाली थे की वो रात में चाँद निकलने पर अभ्यास करते थे इसलिए उनके साथियो ने उन्हें ध्यान चंद बुलाना शुरू कर दिया।
इलाहबाद में जन्मे इस हॉकी के जादूगर ने हिंदुस्तान के लिए 3 ओलंपिक्स गोल्ड मैडल जीते है। एम्स्टर्डम (1928)  los angeles (1932) बर्लिन(1936) इन्होंने अपने पुरे कैरियर में 400 गोल किये है जो अभी तक सबसे उच्चतम है। ऑस्ट्रेलियन लेजेंड डॉन ब्रैडमैन ने यहाँ तक कह डाला की 'ये गोल ऐसे करते है जैसे क्रिकेट में रन बनते है'
भारत की तरफ से हॉकी में फॉरवर्ड पोजीशन पे खेलने वाले ध्यान चंद के बारे में एक किस्सा बड़ा मश्हूर है ।नीदरलैंड में इनकी हॉकी स्टिक पे ये कहके रिसर्च शुरू की गई की इसमें या तो मैगनेट लगा है या गोंद , तभी बॉल इनकी स्टिक से चिपक जाती है और कोई छीन भी नही पाता था। अब इसे तो जिज्ञासा ही कह सकते है पर दद्दा भी इतने कमाल के थे की अपनी सच्चाई बरक़रार रखने के लिए इन्होंने एक महिला से उनकी छड़ी ली जो हॉकी स्टिक नही थी , उससे गेम खेला और गोल भी किया । इसे कहते है एक तीर से दो निशाने। उनका अंदाजा तो इतना सटीक था की एक मैच में वो गोल नही कर पा रहे थे तो रेफरी से कहा की ये गोल पोस्ट अंतरास्ट्रीय माप दंड के अनुसार नही बना है ,उनकी शिकायत पर जब माप ली गई तो वो सही साबित हुए।इनका सबक सीखने का अंदाज़ भी जुदा था एक बार 1936 में जर्मनी के गोल कीपर ने उन्हें धक्का दे कर उनका एक दांत तोड़ दिया तब उन्होंने मैदान में वापस आ कर रणनीति बनाई और सब खिलाडीयो से बोल दिया पुरे समय बॉल जर्मन खेमे में रहनी चहिये जिससे गोल कीपर हर वक़्त चिंता में रहे की गोल कभी भी पड़ सकता है, लेकिन गोल मारना नही है अंत के चंद मिंटो में गोल मार कर मैच जीत लेंगे और हुआ भी वही।
इन बातो को दोहराने का क्या फायदा ...एक तरफ जहा विदेशो में इनके नाम की धूम थी जैसे जर्मनी के हिटलर ने इन्हें वहा की सिटीजनशिप ,आर्मी में बड़ी पोस्ट और बेहतर ज़िन्दगी का भरोसा दिलाया पर ध्यान चंद जी ने अपने देश को तरहीज़ दी...... लंदन में एस्ट्रो-टर्फ पिच को उनका नाम दिया गया .....ऑस्ट्रिया में उनका एक विशाल स्मारक बनाया गया जिसमे उनके 4 हाथ 4स्टिक के साथ उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित किया गया ।  वही दूसरी तरफ उनके ही देश में उनको वो इज़्ज़त नही दी गई। ऐसा नही है की इनपर ध्यान नही दिया गया । इनके लिए भारत सरकार ने 'राष्ट्रिय खेल दिवस' उनके जन्म दिन 29 अगस्त को घोषित किया , जिस दिन राष्ट्रपति खेल पुरस्कार देते है। उनको खुद भी कई सम्मान दिए गए है जैसे भारत का पदम् भूषण (1956) ,जेम ऑफ़ इंडिया ,20th नेशनल अवार्ड 2012 इनको दिए गए । इसके अलावा ध्यान चंद अवार्ड 2002 से दिया जाने लगा (खेल में अभूतपूर्व योगदान के लिए) । ध्यान चंद के नाम पर यहाँ मलिहाबाद के आस-पास ध्यान चंद स्पोर्ट्स स्टेडियम भी है यहाँ तक ध्यान चंद क्रिकेट अकादमी भी है।
वैसे तो इन्होंने अपने खेल कैरियर (1928-1948) के बीच काफी सरहनीय कारनामे किये है,पर एक किस्सा उनका बड़ा ही अचंभित करता है। 1932 समर ओलंपिक्स हॉकी फाइनल का मैच था जब इंडिया ने अमेरिका को 24-1 के विशाल फर्क से हराया था इसमें ध्यान चंद जी के 8 गोल थे और इनके भाई ने 10 गोल मारे थे तबसे इनकी जोड़ी को हॉकी ट्विन्स बुलाया जाता है।
इतना सब होते हुए भी सरकार उनको भूल के बैठ गई। जब बारी आई सर्वश्रेष्ठ सम्मान की तब इस जादूगर का जादू न चला । न जाने ये गन्दी वोट बैंक की राजनीति थी या कुछ और जिसका शिकार हुए दद्दा। इन्होंने उस समय नाम कमाया जब मीडिया इतना प्रभावी नही था जो उचे स्वर में इनकी उपलब्धिया गिनाता फिर भी पुरे विश्व में इनके चर्चे थे.....
हम ये नही कहते की सचिन महान नही है, परध्यान चंद के आगे अभी इन्हें नही देखते । बेशक सचिन भगवन है पर सिर्फ क्रिकेट के पुरे खेल जगत के नही। सचिन पूरी काबिलियत भी रखते है भारत रत्न होने की पर इसके सबसे पहले हकदार मेजर ध्यान चंद ही थे।