Thursday, 19 November 2015

पंचायती मेट्रो


कोई बड़ा शहर हो या छोटा शहर मेट्रो की रट सब जगह ही लग रही है। हर शहर अपने-अपने ट्रैफिक से इतना परेशान है की मेट्रो की फैन मचाए बैठा है, ऐसे में सरकारे भी सोच रही है इस हल्ले को कम करने के लिए मेट्रो नाम की चुसनी शहरवासियों के मुँह में ठूस के रखो । कभी न कभी मेट्रो आ ही जाएगी इस ख्याल से सब खुश है।
         अच्छा मैंने ये सुना है , मेट्रो का पहला डब्बा महिलाओ के लिए आरक्षित होता है, तो वहा खूब बातें होती होंगी और नए-नए किस्से भी सुनने को मिलते होंगे। इस उम्मीद में मैं जब दिल्ली गई ,महिला डिब्बे में सफ़र करने की सोची और अपने दांत चिंयार के डब्बे के अंदर पहुच भी गए.......पर वहा का समीकरण तो बिलकुल ही उल्टा निकला , न तो कोई आपस में बातचीत करता है, न ही एक दूसरे को कोई भली तरह देखता ही है, अगर किसी से नज़रे मिल जाए तो मुस्कुराना भी कोई उचित नही समझता, ऐसे हालात और लेडीज डिब्बे के। बड़ी निराश हुई ....हमे तो लगा था जैसे पहले के समय में सर्दियो की दोपहर को धुप खाने के लिए औरते छतों पे या अपने घर के  द्वारे  पे खटाई डाल के बैठ करती थी, अचार की खाने की रेसिपी  एक दूसरे को बताया करती थी, ऊन की सिलाई से बातो का स्वेटर बुना करती थी,महंगाई की उलझनों से मटर छिला करती थी, सब्जिया काटी जाती थी, पूजा पाठ की तिथि, गाना बजाना, मूंगफली खाना ये सब हुआ करता था, वैसा ही कुछ मेट्रो के लेडीज डब्बे में होता होगा, पर यहाँ तो किसीको मुस्कुराने तक का भी समय नही है।
वो ज़माना तो अब का युवा वर्ग न देख सका  पर अब लगता है ये पंचायती चौपाल इतिहास बनकर रह जाएगी शायद मेट्रो का सफ़र काफी छोटा है इतना छोटा की अचार तो छोड़ो इतने में हल्दी भी न पक पाए ।
शायद दिल्ली बहुत बड़ा शहर है , जब मेट्रो किसी छोटे शहर आएगी,तब देखते है कितनी कहानिया बनेगी ,कितने सीरियल या उनकी कहानियो की चर्चा हुआ करेगी, अपनी अपनी जीवन समस्याए और उनका निवारण मिला करेगा , या ये सब न भी हो तो कमसे कम एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने की प्रथा तो चलेगी ही चलेगी ये रिवायत तो कोई नही छीन सकता।  जय हिन्द।

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