दुनियाँ ,देश, धर्म ,जाति सबसे एक मत बटा हुआ इंसान, विश्व स्तर पर धर्म जाति को लेकर इतने मत नही है जितने हमारे राष्ट्र भारत में है। कहते है भारत एक ऐसा देश है जिसमे हर धर्म को बढ़ावा मिलता है। हिन्दू धर्म की उत्पत्ति भी यही बताई जाती है क्योंकि सनातन धर्म के अवतार कहे जाने वाले राम और कृष्ण का जन्म यही हुआ था। शायद इसलिए यहाँ हिन्दू धर्म को ज़्यादा आंकते है परन्तु दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी मस्जिद केरल में 600 B.C में एक हिन्दू राजा के द्वारा बनवाई गई थी। ये बात बहुत कम लोग जानते है क्योंकि उसका रख रखाव भी नही किया गया। इसके अलावा भारत देश में कुल 3,00,000 मस्जिदे है जो दुनिया के किसी और देश में नही है और मुसलमानो की सबसे ज्यादा खुश रहने की तादात भी भारत में ही है। इसलिए इस्लाम को दूसरा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है। ऐसे ही दो धर्म और है जैन धर्म और बोद्ध धर्म जिनकी उत्पत्ति या बढ़ावे में भारत देश को सबसे अहम् मानते है। मानना चाहिए भी हम यूँ ही तो नही है प्रजातंत्र हमने अपने देश को धर्म से जोड़ा है, हमने हर रंग को रौशनी को पनाह दी है, दिलो में प्यार भरा है इसलिए हम अनोखे है।
जहा एक तरफ विश्व में धर्म से आज़ादी जैसे मुद्दों पर बात चल रही है । ऐसे में दुनिया धर्मकांडो में निपुण भारत का नजरिया एवं पक्ष जानने को उत्सुक है कि क्या धर्म से आज़ादी मिलनी चाहिए? हमारा देश चारो तरफ से धर्म से जुड़ा हुआ है और तो और कभी-कभी यहाँ के न्यायधीश भी आस्था का हवाला दे कर फैसला सुना देते है। ऐसे देश या देशवासियो से धर्म से आज़ादी वाले मसले पर टिप्पणी लेना न खां में होगा न खामखाँ में इसलिए इतिहास के पन्नों को पलट कर इस सोच की उत्पत्ति के बारे में जानकारी देने की कोशिश करते है की आखिर ये मसला है क्या?
18 वी सदी फ्रांस की क्रांति के समय पहली बार धर्म से आज़ादी के मसले ने लोगो का ध्यान अपनी तरफ खीचा था। धर्म से आज़ादी का मतलब आप यानी आम जनता में से कोई भी कभी भी अपने धर्म को छोड़ सकता है लेकिन उसे कोई और धर्म को अपनाने की ज़रूरत नही है वो बिना किसी धर्म के जीवित वह सम्मानित व्यक्ति की तरह अपना जीवन निर्वाह कर सकता है। ऐसे लोगो का मानना होता है की दुनिया में कोई भगवान् देवता या दैवीय शक्ति नही होती , वो किसी को पूजनीय नही मानते। ऐसे लोगो को अक्सर नास्तिक बोलते है ।
बड़ी ही मज़ेदार बात है पर किसी भी धर्म या भगवान् में न मानने वाला भी एक धर्म इस दुनिया में प्रचलित है और वो है बौद्ध धर्म यहाँ न तो कोई भगवान् है न ही कोई देवता इसकी उत्पत्ति करने वाले कर्ता-धर्ता ने लोगो से उनके साथ जुड़ने को कहा । कही न कही वो सबको धर्म से आज़ाद ही कर रहे थे , पर ये काम करते-करते वो खुद इतने महान होगए की उनके ही लोगो ने उन्हें अपना भगवान बना लिया। ऐसे में एक ख़याल दिमाग में आता है "कभी भी किसी से उसका धर्म मत छीनो वरना लोग तुम्हे अपना धर्म बना देंगे" ।
दुनिया में धर्म से आज़ाद लोगो की संख्या पता लगा पाना तो मुश्किल है पर गल्लोप इंटरनेशनल ने एक सर्वे रिपोर्ट जारी कर ये बताया है की 2015 में 64,000 लोगो पर किया गया एक टेस्ट में 11% लोग नास्तिक बनने के लिए मान गए , 2012 में 13% लोग माने थे । इस वक़्त 8% जनसँख्या नास्तिक लोगो की पूरी दुनिया में मानी गई है।जिनमे से सबसे ज़्यादा यूरोप और पूर्व एशिया में पाए जाते है मसलन सबसे ज़्यादा लोग वहा धर्म से आज़ादी का समर्थन कर रहे है। चीन भी इस मुद्दे से अलग नही है वहा भी बढ़ चढ़ कर धर्म से आज़ादी ले रहे है। इन आकड़ो के अलावा आस्तिक लोगो की एक मान्यता भी सामने आई है पुरे यूरोप में 20% हर धर्म के लोग भगवान् को नही मानते ।
इस मसले से कार्ल मार्क्स भी अछूते नही है उन्होंने धर्म पर टिप्पणी कुछ इस तरह की "धर्म ह्रदय रहित दुनिया का ह्रदय है और आत्मा रहित दुनिया की आत्मा है" ।
मेरा धर्म मेरी आज़ादी एक सोच है जिसके बारे में इस देश के नागरिको को कोई ख़ास जानकारी नही है परन्तु आज की दुनिया का ये एक अहम् हिस्सा है जिससे हमे रु-ब-रु होना ही पड़ेगा। एक हिन्दू,मुसलमान,सिख या ईसाई होने की वजह से आपको धर्म से आज़ादी पर सोचने में मुश्किल हो सकती है पर एक इंसान बनकर सोचने से एक रास्ता मिल सकता है।
हमारे भारत देश का संविधान हमे धर्म चुनने की आज़ादी तो देता है पर धर्म से आज़ादी नही देता। कहा 18 वी सदी में यूरोप में ये मसला उठ गया कहा 2015 में 69 वी वर्षगांठ पर हमे इसकी या ऐसी सोच की जानकारी देनी पड़ रही है। फर्क को समझिये।
जय हिन्द ।
Friday, 14 August 2015
मेरा धर्म मेरी आज़ादी
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