मैं मेजर ध्यान चंद की अनुज्ञाई । आज फिर वही पुरानी बात याद आई जिससे मुझे सरकार द्वारा उन्हें नज़र अंदाज़ करना याद आया।एक किस्सा तो आप सबको भी याद होगा जब भारत रत्न देने पर उनसे आगे सचिन(जो की खुद एक महान खिलाडी है) को दिया गया , पर एक किस्सा और है जब दद्दा के ज़िंदा रहते भारत सरकार ने उन्हें भुला दिया था। बात कुछ यु थी वो 51 वर्ष के थे आर्मी से सेवा निवृत हो चुके थे, पैसो की तंगी थी ,लेकिन हॉकी का जूनून तो बस एक जवान से बढ़ कर था, । उम्र तो ढल चुकी थी पर वो अहमदाबाद पहुच गए एक टूर्नामेंट को देखने , उन्हें लगा शायद यहाँ के लोग उन्हें पहचान जाएंगे और अंदर आने देंगे पर ऐसा नही हुआ ।उन्हें बुरी तरह धक्का देकर स्टेडियम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया फिर भी उनकी शालीनता का अंदाजा लगाइये जो उन्होंने इस वाकये के खिलाफ कोई कदम नही उठाया। अगर सरकार भूल गई हो तो उन्हें ये याद दिला दे की ये वही मेजर ध्यान चंद है जिन्हें 'the wizard' नाम से जाना जाता था उनका असल नाम ध्यान सिंह था । वो इतने प्रभावशाली थे की वो रात में चाँद निकलने पर अभ्यास करते थे इसलिए उनके साथियो ने उन्हें ध्यान चंद बुलाना शुरू कर दिया।
इलाहबाद में जन्मे इस हॉकी के जादूगर ने हिंदुस्तान के लिए 3 ओलंपिक्स गोल्ड मैडल जीते है। एम्स्टर्डम (1928) los angeles (1932) बर्लिन(1936) इन्होंने अपने पुरे कैरियर में 400 गोल किये है जो अभी तक सबसे उच्चतम है। ऑस्ट्रेलियन लेजेंड डॉन ब्रैडमैन ने यहाँ तक कह डाला की 'ये गोल ऐसे करते है जैसे क्रिकेट में रन बनते है'
भारत की तरफ से हॉकी में फॉरवर्ड पोजीशन पे खेलने वाले ध्यान चंद के बारे में एक किस्सा बड़ा मश्हूर है ।नीदरलैंड में इनकी हॉकी स्टिक पे ये कहके रिसर्च शुरू की गई की इसमें या तो मैगनेट लगा है या गोंद , तभी बॉल इनकी स्टिक से चिपक जाती है और कोई छीन भी नही पाता था। अब इसे तो जिज्ञासा ही कह सकते है पर दद्दा भी इतने कमाल के थे की अपनी सच्चाई बरक़रार रखने के लिए इन्होंने एक महिला से उनकी छड़ी ली जो हॉकी स्टिक नही थी , उससे गेम खेला और गोल भी किया । इसे कहते है एक तीर से दो निशाने। उनका अंदाजा तो इतना सटीक था की एक मैच में वो गोल नही कर पा रहे थे तो रेफरी से कहा की ये गोल पोस्ट अंतरास्ट्रीय माप दंड के अनुसार नही बना है ,उनकी शिकायत पर जब माप ली गई तो वो सही साबित हुए।इनका सबक सीखने का अंदाज़ भी जुदा था एक बार 1936 में जर्मनी के गोल कीपर ने उन्हें धक्का दे कर उनका एक दांत तोड़ दिया तब उन्होंने मैदान में वापस आ कर रणनीति बनाई और सब खिलाडीयो से बोल दिया पुरे समय बॉल जर्मन खेमे में रहनी चहिये जिससे गोल कीपर हर वक़्त चिंता में रहे की गोल कभी भी पड़ सकता है, लेकिन गोल मारना नही है अंत के चंद मिंटो में गोल मार कर मैच जीत लेंगे और हुआ भी वही।
इन बातो को दोहराने का क्या फायदा ...एक तरफ जहा विदेशो में इनके नाम की धूम थी जैसे जर्मनी के हिटलर ने इन्हें वहा की सिटीजनशिप ,आर्मी में बड़ी पोस्ट और बेहतर ज़िन्दगी का भरोसा दिलाया पर ध्यान चंद जी ने अपने देश को तरहीज़ दी...... लंदन में एस्ट्रो-टर्फ पिच को उनका नाम दिया गया .....ऑस्ट्रिया में उनका एक विशाल स्मारक बनाया गया जिसमे उनके 4 हाथ 4स्टिक के साथ उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित किया गया । वही दूसरी तरफ उनके ही देश में उनको वो इज़्ज़त नही दी गई। ऐसा नही है की इनपर ध्यान नही दिया गया । इनके लिए भारत सरकार ने 'राष्ट्रिय खेल दिवस' उनके जन्म दिन 29 अगस्त को घोषित किया , जिस दिन राष्ट्रपति खेल पुरस्कार देते है। उनको खुद भी कई सम्मान दिए गए है जैसे भारत का पदम् भूषण (1956) ,जेम ऑफ़ इंडिया ,20th नेशनल अवार्ड 2012 इनको दिए गए । इसके अलावा ध्यान चंद अवार्ड 2002 से दिया जाने लगा (खेल में अभूतपूर्व योगदान के लिए) । ध्यान चंद के नाम पर यहाँ मलिहाबाद के आस-पास ध्यान चंद स्पोर्ट्स स्टेडियम भी है यहाँ तक ध्यान चंद क्रिकेट अकादमी भी है।
वैसे तो इन्होंने अपने खेल कैरियर (1928-1948) के बीच काफी सरहनीय कारनामे किये है,पर एक किस्सा उनका बड़ा ही अचंभित करता है। 1932 समर ओलंपिक्स हॉकी फाइनल का मैच था जब इंडिया ने अमेरिका को 24-1 के विशाल फर्क से हराया था इसमें ध्यान चंद जी के 8 गोल थे और इनके भाई ने 10 गोल मारे थे तबसे इनकी जोड़ी को हॉकी ट्विन्स बुलाया जाता है।
इतना सब होते हुए भी सरकार उनको भूल के बैठ गई। जब बारी आई सर्वश्रेष्ठ सम्मान की तब इस जादूगर का जादू न चला । न जाने ये गन्दी वोट बैंक की राजनीति थी या कुछ और जिसका शिकार हुए दद्दा। इन्होंने उस समय नाम कमाया जब मीडिया इतना प्रभावी नही था जो उचे स्वर में इनकी उपलब्धिया गिनाता फिर भी पुरे विश्व में इनके चर्चे थे.....
हम ये नही कहते की सचिन महान नही है, परध्यान चंद के आगे अभी इन्हें नही देखते । बेशक सचिन भगवन है पर सिर्फ क्रिकेट के पुरे खेल जगत के नही। सचिन पूरी काबिलियत भी रखते है भारत रत्न होने की पर इसके सबसे पहले हकदार मेजर ध्यान चंद ही थे।
Wednesday, 24 June 2015
खोता सितारा
Saturday, 20 June 2015
For MJMC sem-2" beware of our receptionist"
शायद ही वो समय हम सब में से कोई भूल सकता है। जब फेयरवेल पार्टी के लिए जगह तलाशने की जदोजहत मे, मैं और निधि निकल पड़े पुराना लखनऊ को तराशने (इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए भी किया गया है क्योंकि कई रेस्टोरेंट के मालिको को हुमलोग काम करने के सलीके भी सीख आए थे) । एक ज़िद भी थी की सबको ये साबित करने है की पुराना लखनऊ नए लखनऊ से अच्छा ,सस्ता और सुन्दर है। वहा तपती धुप में मुझे निधि के स्कूटी पे 'पलक होटल' दिखा , जो सामने से तो ठीक ही दिख रहा था......फिर सोचा क्या पता अंदर से अच्छा हो। पार्टी के होस्ट की हैसियत से बात करने का तमगा ज़िन्दगी में पहली बार हासिल किया था, इसलिए हम दोनों पुरे टशन में अंदर जा पहुचे......आँखों ने जैसे ही जगह का दीदार किया ,मैं और निधि दोनों ही जुड़वाँ बच्चों की तरह एक साथ बोल पड़े डन(done) .....इतनी ख़ुशी की हुमदोनो बर्दाश्त ही नही कर पा रहे थे और रिसेप्शनिस्ट से बात भी पूरी बत्तीसी दिखा कर कर रहे थे........कोशिश थी कि उसे ये एहसास न हो की ये जगह देख के हम दोनों मगन हो चुके है , पर क्या करे दिल तो बच्चा है जी......थोडा कच्चा है जी। बात करने की तमीज तो थी नही फिर भी किसी तरह हम दोनों ने बात कर के पूरा बजट लिखवा लिया और उसको ये आश्वासन तक दे डाला की कल, परसो हम सब यहाँ आएँगे फिर बात पक्की कर देंगे। इतना कहते ही हुमदोनो मुस्कुराते हुए वहा से निकले और घर को चले गए। उस दिन शाम तक पुरे भोकाल से सबको फ़ोन करके बता दिया की बहुत अच्छी जगह मिली है ,शायद ही कोई ढूंढ पाए ऐसी जगह 'feeling party at taj mahal ' जैसे हालात थे......
दूसरे दिन सबको इकठा कर निकल पड़े जब तीन यार तो बात ही क्या? पर लोग तीन से ज़्यादा हो तो कांड ही क्या?.....हम सब मतलब मैं,पूजा,सोनाली,निधि,सौरभ,सुशील,आकाश,पंकज,आशुतोष,विकास । हम सबको देख के वो रिसेप्शनिस्ट खुश हो गई ,उसे लगा आज तो एडवांस पक्का है.....जब बजट की बात हुई तो हम मासूमो के चेहरे देख कर उसने थोडा रहम किया , उसने सारा मामला थोडा और सीधा और छोटा कर दिया...हम सब थोड़े खुश हुए फिर जा के म्यूजिक सिस्टम चेक किया तो उसने और निराश कर दिया ,एक छोटा सा प्लेयर जिससे ज़्यादा आवाज़ तो मेरी बुलंद थी....हम वो गलती भी नही दोहराना चाहते थे जो फ्रेशर्स के समय म्यूजिक को लेकर होगई थी.....पर जगह इतनी सुन्दर थी की हमसब वही पार्टी करना चाह रहे थे । पूरा पार्टी का महल ढहता जा रहा था। अब जब हम सब सोच में पड़े थे ,तो पूजा बोली 'रुको एक बार मैं कोशिश करती हु ,अगर ये पैसे कम कर दे तो म्यूजिक का इंतेज़ाम अलग से हो जाएगा '.....शायद पूजा के रूप में एक उम्मीद दिखी तो हुमलोगो ने उसको बात करने को कहा....एक इकलौती उम्मीद वो भी ऐसे भुजी या यु बोले की बूती ....बेचारी रिसेप्शनिस्ट का चेहरा ही बोल उठा 'MJMC SEM-2 not allowed' एक तो वैसे भी 50 लोगो की पार्टी का बजट वो खुद 15 हज़ार में ले आई ..उस पर से हम लोग उसका दिमाग खा गए .....50 लोगो के खाने के लिए सिर्फ 15 रोटियों का आर्डर दे डाला ,स्नैक्स की प्लेट भी 12 तक सिमित कर दी । हुमलोगो का ऐसा सटीक अंदाजा देख कर पहले तो उसके दिल में तालिया बजी होंगी., फिर वो बौखला कर बोल उठी '50 लोगो की पार्टी है भइया ,इतने में नही होती है,हमारा होटल है, हुमलोग हलवाई नही है' उसकी बातें सुन कर हुमलोगो को हँसी आ गई ,चुकी इतने मासूम चेहरे देख के और खुद प्रोफेशनल हो के उसने अपने आपको काबू में किया ........इससे पहले वो हुमलोगो को काट खाती हम सब वहा से निकल लिए ये आश्वासन देके की सोच कर आपको बताएंगे..,... अब तक तो वो भी समझ चुकी थी की हुमलोग आखिर कितना सोच सकते है । बाहर निकल कर आपस में कुछ बात चीत की फिर हमारी और निधि की पसंद की सबने तारीफ कर सब लोग अपने-अपने रास्ते चल दिए .......उसके बाद मैंने कई बार सोचा कुछ खाने के बारे में उसी रेस्टोरेंट में जा कर कुछ खाने की पर आज भी उस रिसेप्शनिस्ट का चेहरा याद करके हम सहम जाते है ....इससे पहले वो बोर्ड लगा दे 'Not allowed ' का हमे भूखे रहना ही सही लगता है।
Thursday, 11 June 2015
भारत को ज़रूरत है आपकी!
इंडिया.....
इंडिया......
आजतक इस तरह हर एक भारतीय ने इंडिया का उत्साह बढ़ाया है, चाहे वो भारत में रह कर टी.वी या स्टेडियम में बैठ कर करे .....या कहीं किसी और देश की ज़मीन से जुड़ कर करे....ये तरीका जो लोग अपनाते है,वो ज़्यादातर क्रिकेट में ही देखने को मिलता है । जैसे और कोई खेल तो इस देश में होता ही नही है। अब ये आपकी मर्ज़ी है ,जिस खेल को चाहे बढ़ावा दे ! उत्साह प्रदान करे.....पर इतनी बड़ी आबादी और सिर्फ एक खेल !......बड़ी नाइंसाफी है जनाब।क्रिकेट तो पुरे दिन का खेल है फिर भी हर क्रिकेट प्रेमी जो हिंदुस्तानी हो कर भी अपने आपको एक दिन के लिए फ्री कर देता है। अच्छी बात है....ये तो अपनी-अपनी पसंद है..पर भइया फुटबॉल से क्या दुश्मनी है....डेढ़ घंटे का ये खेल ,हर मिनट रोमांच से भरा,पुरे समय खिलाडी पसीना बहाते है। धुप में मेहनत करते है .....किस लिए?....आपके लिए।
'पर हमारी टीम फीफा में खेलती कहा है'
बिलकुल सही... खेलेगी भी कैसे....आपने कभी उनका उत्साह भी तो नही बढ़ाया .....कभी एक बार भी उनका कोई मैच देखा है?......अच्छा यही बता दीजिये की फीफा में इंडिया की रैंकिंग कितनी है?.... नही पता न। तो फिर आज से और अभी से दिन में क्रिकेट और रात 7:30 बजे से फुटबॉल मैच देखिये.....आपकी टीम को ज़रूरत है आपकी....आपके सपोर्ट की...।शायद अब तभी हमारी टीम फीफा में क्वालीफाई कर पाएगी। आपकी जानकारी के लिए बता दू अभी हाल ही में हमारी फुटबॉल टीम 6 स्थानों की छलांग लगा कर फीफा में 147 से 141 पर काबिज़ हो गई है,रही बात टीम के क्वालीफाई करने की तो एशियाई क्वालीफ़ायर शुरू हो गए है जिसके 2 मैच बेंगलुरु में खेले जाने है ....ये आपके समक्ष पूरा फॉर्मेट....
11-06-2015= india v/s oman
16-06-2015= guam v/s india
08-09-2015= india v/s iran
08-10-2015= india v/s Turkmenistan
13-10-2015= oman v/s india
12-11-2015= india v/s Guam
24-03-2016= iran v/s india
29-03-2016= india v/s Turkmenistan
आपके लिए अबकी बार आपकी फुटबॉल टीम (मैन इन ब्लू) ने बंगलुरु जा कर आर्मी से ट्रेनिंग ली है ,जैसे सोल्डिर्स को मिलती है। मैन इन ब्लू के कोच स्टेफेन कंस्ट्रैंटिं ने आर्मी का आभार व्यक्त कर इसको टीम की अब तक की सबसे बड़ी मदद करार दिया है, क्योकि फुटबॉल एक टीम स्पोर्ट है और इस ट्रेनिंग में इन खिलाडीयो को साथ में खेलना सीखाया गया है.....अगर सब कुछ सही रहा तो अबकी बार एशिया से इंडिया ही क्वालीफाई करेगी ......फिर कॉन्फ़ेडरेशन कप खेलकर हमको रूस 2018 फीफा वर्ल्डकप का टिकट मिल जाएगा .....और ये सब होगा सिर्फ आपके सपोर्ट से....तो समय निकालिये अपने समय से क्योंकि 'भारत को आपकी ज़रूरत है'
हमारी टीम हर हिसाब से काबिल है फीफा के लिए तब ही तो 1950 में इंडिया एशिया से क्वालीफाई कर भी गई थी लेकिन कुछ राजनेतिक कारणों के चलते फीफा को ये कह कर मना कर दिया गया की हमारी टीम के पास जूते नही है और हमारे पास पैसे भी नही है....ये तक फीफा से कह दिया की हमे आपसे आगे बढ़कर ओलंपिक्स में ध्यान देना है । सोचिये अगर तब ऐसा न हुआ होता तो आज इंडिया न जाने कितनी बार फीफा में क्वालीफाई कर चूका होता....तो अबकी बार जूते भी है और समय भी। पुरे जोश के साथ टीम का उत्साह बढाइये फिर वो दिन दूर नही जब हम फीफा की ट्रॉफी घर लेकर आ जाएंगे....
Wednesday, 3 June 2015
फीफा भ्रष्टाचार का तीसरा पहलु
अभी हाल ही ने आई एक खबर के मुताबिक FIFA(fedration of international football association) में 950 करोड़ के आस पास घोटाले की कहानी सामने आई है। इससे कई देश और वहा के लोगो में रोष का महौल है।....होना भी चाहिए आखिर उनका पसंदीदा खेल है। उसमे घोटाला हो तो गुस्सा आना ज़ाहिर है।परंतु भारतीयो पर इसका कोई असर नही दिख रहा है क्योंकि हमे क्या लेने देना।वह चाहे जो कुछ हो । हम तो तब कुछ न उखाड़ पाए जब दिल्ली कामनवेल्थ खेलो का भ्रष्टाचार सामने आया था और अब भी कुछ नही कर पा रहे है जब अपने धर्म अपने क्रिकेट (IPL) का कलंक सामने आया है।...शायद हमे चिंता करनी भी नही चाहिए यहाँ क्रिकेट का मसला थोड़े न हुआ है ये तो फुटबॉल का मसला है जिसमे हमारी कोई टीम भी नही है।
असल में हमे ही कुछ करना पड़ेगा, क्योंकि हमारी एक बहुत बड़ी टीम है वहा। ये बात समझने के लिए कुछ आंकड़े पेश है।
FIFA में जो भ्रष्टाचार हुआ उसका सीधा सा कहर क़तर में रह रहे अप्रवासिय भारतीय मज़दूरों को सहना पड़ रहा है ।क़तर एक ऐसा देश है जहा कफाला तंत्र के तहत इंसान ख़रीदा और बेचा जाता है।
नवंबर 14- ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स के मुताबिक क़तर दुनिया में गुलामो की आबादी में 4th स्थान रखता है। वह पर काम कर रहे गुलामो की संख्या 29400 है जो वहा की आबादी का 1.36% है।
फरवरी 2015- में ये खबर आई थी की क़तर में काम कर रहे 50000 मज़दूरों को ज़बरदस्ती बिना जूतो के मैराथन में दौड़ाया गया वो भी सिर्फ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम शामिल करने के लिए जो बाद में हो भी न सका।
वहा के कफाला तंत्र के मुताबिक नौकरी देने वाले को नौकरी पाने वाले पे पूरा अधिकार मिल जाता है।यहाँ तक दस्तावेज हासिल करना और नौकरी बदलने तक का भी। वहा हर रोज़ मज़दूरों से 45℃ में 14 घंटे बिना जूते,बिना साफ़ पानी के और बिना खाने के काम करवाते है। महीनो वेतन भी नही देते....
इन सभी अमानवीय हरकतों की असल जड़ है फीफा में हो चूका घोटाला। क़तर ने रिश्वत देके 2022 विश्वकप की मेज़बानी तो अपने हाथ ले ली पर वहा के एअरपोर्ट,स्टेडियम,होटल,रोड्स की ये हालात नही है की विश्वकप करा सके । क़तर ने अभी तक इन मामूली व्यवस्थाओ के लिए 638000 लाख करोड़ कर्च कर दिए है। एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी के मुताबिक 2012-13 में भारत,बांग्लादेश और नेपाल के 964 मज़दूरो की मौत क़तर में होगई , जिनमे ज़्यादा प्रचलित कारण थे हार्ट अटैक और लू लग जाना। ITUF(international trade union federation) के मुताबिक 2022 तक यानि विश्वकप तक ये संख्या 4000 में तब्दील हो जाएगी। भारतीय दूतावास (क़तर) की रिपोर्ट के अनुसार
2012-237
2013-241
2014-224 भारतीय मज़दूरों की मौत हुई है। वहा काम कर रहे आप्रवासिय मज़दूरों में 22% भारतीय वह 16%नेपाली है। क़तर पूरी तरह से अपने कामकाज के लिए अप्रवासिय मज़दूरों पे निर्भर करता है। वहा की वर्क फ़ोर्स 94% अप्रवासिय मज़दूरों की है।
हैरानी की बात ये है की इन सब आकड़ो की जानकारी होने के बावजूद फीफा के अधिकारियो ने क़तर को मेज़बानी सौप दे। फीफा में हुए घोटाले का असर सिर्फ फीफा पे ही नही पड़ा है बल्कि इन मज़दूरों पे भी पड़ा है। इनकी पीड़ा सिर्फ इतनी है की इन से मानवीय तरीको से काम करवाया जाए ,काम करने की बुनियादी सुविधाए दी जाए पर क़तर की सरकार को ये सब न गवार है ।उनको तो बस एक लक्ष्य दिख रहा है(मिशन 2022) वो अपना काम करवाने के लिए साम दाम दंड भेद का भी इस्तेमाल करेंगे। फीफा ने इससे पहले इतनी अस्मवेदंशीलता नही दिखाई पर ये नियत जो न कराए सो कम है।
मुझे अपनी ज़िम्मेदारी लगी आप तक ये बात पहुचना तो मैंने पंहुचा दी।
Monday, 1 June 2015
अदावतो का ज़माना (तब से अब)
लोग कहते है ...आज की युवा पीढ़ी को प्यार का मतलब ही नही पता... शायद ये लोग जो कह रहे है ये सच है।
आज अचानक याद आ गई अपने नाना-नानी की ज़िन्दगी में उनके उलझने बहुत थी ,बड़ा सा परिवार तीन बेटे दो बेटियां, सबकी शादी करना फिर उनके बच्चे। उस बीच नाना का कमाने जाना और नानी का सबके साथ मिल बाट कर पुरे घर को संभालना , सबमे प्रेम बना रहे इसका ख़याल रखना,.......परिवार की इन ज़िम्मेदारियों को सँभालते-सँभालते क्या नाना-नानी एक दूसरे को भूल गए थे....ऐसा तो कुछ भी नही होता था....जहा तक मुझे याद है । नानी दिन में दो बार सुबह और शाम श्रृंगार करती थी साडी बदलती थी, शाम को जुड़ा छोटी बनती थी, और नाना के आने का इंतज़ार करती थी। वही दूसरी तरफ नाना .....उनका बस एक ही काम होता था , कही भी जाने से पहले वो नानी से मिलके जाते थे और हर बार कहते थे"अभी आते है" नानी शर्मा कर अंदर आ जाती थी। ये सब मुझे इसलिए भी याद है क्योंकि काफी बड़े होने तक मैंने नाना और नानी को देखा है । एक वो दौर था एक ये दौर है जहा मैं अपने मम्मी-पापा को देखती हु । मेरी मम्मी नानी को देख कर शाम को तैयार हो कर पापा का इंतज़ार करना तो सीख गई और ये भी सीख गई की प्यार कैसे देखाया जाता है पर पिताजी ने नाना से कुछ न सीखा। वो तो मस्त रहते है बस उनके प्यार का मतलब है चार लोगो के सामने मम्मी को उनके घर और दिल की मालकीन साबित कर देना ।इसे प्यार का दूसरा पड़ाव भी कह सकते है जहा वो पुरे समाज के सामने मम्मी को अपनी मालकीन कहने का दम रखते है ।और तो जो नोक-झोक होती है .....जब पापा किचन में जा कर मम्मी को खाना बनाना सीखने लगते है और मम्मी उन्हें बाहर का रास्ता देखा देती है । ये तो प्यारी से झलकिया है ....अब आती है बारी एक और दौर की । दीदी-जीजा जी की इनकी शादी में जब दीदी वरमाला लेके स्टेज पे आने वाली थी तो जीजा जी अपने दोस्तों को धक्का देके उनके पास पहुच गए थे और उनका हाथ थाम के स्टेज पर ले आए थे ।सबने उनके इस कदम को बड़ा सराहा फिर जब वरमाला डाली तब दीदी को एक किस भी दे दिया वही स्टेज पर अबकी कुछ लोगो ने सराहा 'बड़ा प्यार है दोनों में , इनदोनो को नज़र न लगे' ।
अब अगर इन तीनो परिस्तिथयो का आकलन करे तो नानी नाना एक दूसरे का नाम नही लेते थे (ऐ जी ओ जी से काम चलाते थे)। मम्मी पापा ने भी एक दूसरे का नाम नही लिया (मम्मी पापा को गुप्ता जी बुलाती है और पापा मम्मी को सुनिए जी कह देत है) । .....दीदी जीजा जी एक दूसरे का नाम लेते है । देखा जाए तो सबमे अलग तरह का प्यार है मिठास है सबने अपने रिश्ते की एक परिभाषा गढ़ रखी है ,जिसे सिर्फ वही दोनों समझ सकते है । अब सोचने वाली बात तो ये है की यहाँ तक तो ठीक है अब आगे आने वाली पीढ़ी कौनसी नयी परिभाषा को जन्म देगी ।
काश! हम ये चुन पाते की हमे कौन से अदवती ज़माने से ताल्लुख रखना है। हमे नही चाहिए कोई दिखावे वाला ठप्पा ।हमे तो बस एक दूसरे के लिए अपना प्यार ,साथ और समर्पण साबित करना है। जैसे कठिन परिस्थिति में नाना नानी करते थे। एक दूसरे का सम्मान कर के मम्मी पापा करते है .....समाज में एक दूसरे का मान दीदी और जीजा जी रखते है।हमे सबसे कुछ न कुछ सीखना है तब कोई नही कहेगा की हमे प्यार करना नही आता । और अपना भी तो एक अफ़साना लिखना है तभी तो आगे आने वाले हमसे कुछ सीखेंगे , फिर चाहे वो ऑफिस से थक के वापस आने पर भी उनकी पसंद का खाना बनाना हो या उनका घर आते वक़्त एक मोगरे का गजरा ही ले आना हो।.....एक अफ़साना याद है न.....