Saturday, 10 October 2015

लखनऊ को समझने की एक कोशिश

इतने सालो से गहन अध्यन चला कई फैसले आए गए पर आज भी इस सवाल का जवाब नही मिल पाया की आखिर लखनऊ के और शेहरो से अलग होने का कारण क्या है? अब तो मेट्रो भी आने वाली है,प्रदेश सरकार ने काफी तेज़ी भी दिखा दी है ,इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम जैसे कई चीज़ों की सौगात देकर लखनऊ को ताकतवर बना दिया पर वही बात है न लखनऊ बहुत समय पहले से प्रदेश की राजधानी रहा है इसका मतलब हर नई योजना की सौगात का स्वाद सबसे पहले लखनऊ वाले चटोरे ही चखते आ रहे है और हम भी हर नज़राने(तोहफे) को और प्रदेशो की राजधानियों की तरह स्वीकार  करते आ रहे है पर फिर भी हम अलग क्यों है?
अजब जीवन है भाई यहाँ का कहने को तो एक शहर है लखनऊ पर लोग एक जगह ठहरते भी है । कई कार्निवाल मेले भी जाते है(आपस में मिलते जुलते भी है)  इस चमक दमक के पर शांति भी है। अब यहाँ भगवान् द्वारा कोई वरदान तो प्राप्त नही है की हम शहरवासी भी हो और खुश भी ?तो फिर ये हो कैसे रहा है और तो और मज़ाक-मज़ाक में एक सर्वे रिपोर्ट हाथ लगी उसमे ये कहा गया की पुरे दर्श में सबसे खुश रहने वाला दूसरा शहर है लखनऊ। मेरे मन में सवाल यही से उठा हुआ है की आखिर कैसे ?क्या फर्क पड़ता है ?बस वो दिन है और आज का दिन है,मैंने अपने रोज़मर्रा के कामो के साथ-साथ इस अध्यन को भी जोड़ लिया। अरे! वही पता लगाने का की लखनऊ शहर होने के बावजूद इतना खुश और अच्छा कैसे है ? तो मेरा सफ़र शुरू हुआ दुबग्गा ,चौक, घंटाघर ,बड़ा इमामबाड़ा, हज़रतगंज, अमीनाबाद, कैसरबाग, गोमतीनगर, अलीगंज,बुद्धेश्वर, आलमबाग इन सभी जगह पर मौका पड़ते ही अध्यन शुरू किया और हर बार मुझे एक ही जवाब मिला और वो है 'फुरसती'
ये शहर किसी भी बड़े शहर की तरह चलता फिरता है यहाँ नाईट लाइफ है तो बहुत सारे रोज़गार के मौके भी ,पढाई लिखाई का भी स्तर काफी हद तक संभल गया है, और जगह के युवाओ ने भी लखनऊ का रुख किया है ,सफाई भी रहने लगी है,काम काज में तेज़ी भी आई है और तो और अपने मुख्यमंत्री साहब भी तो 40 साल के युवा है बस पार्टी ही थोड़ी उम्रदराज़ है | यहाँ जोश है जुनून है खाना है नवाज़गी है शायर है उनकी शायरी है पर इन सब पर भरी है 'फुरसती' वो ऐसे की जबसे गोमती नदी की सफाई का अभियान चला है तबसे पक्के पुल पे आए दिन साइकिल वाले,बाइक वाले, कभी-कभी कार वाले रुक-रुक के बड़ी फुरसत के साथ 10/- की मूंगफली खरीदते है और खड़े-खड़े सफाई अभियान का काम देखते हुए मज़े लेते है । ऐसे में लखनऊ का बिज़नेस भी चमकता है ।पहले तो पुल पे सिर्फ मूंगफली बिकती थी अब चाय भी बिकने लगी है । मैं तो सोच रही हूँ क्यों ना दो-चार को आईडिया देकर शहर का थोडा सा स्टैण्डर्ड बढ़ाते है और मूंगफली चाय के साथ पॉपकॉर्न भी बिक्वाते है।
अगर आपको ऐसा लग रहा है की ये काम सिर्फ दो-चार लफंदर,लपाड लड़को का है तो ऐसा नही है ,वहा कई लडकिया, महिलाए ,बूढ़े, जवान ,बच्चे सब आते है और टाइम पास करते है।
चूँकि ये फुरसती का कीड़ा पुरे शहर में रेंग चूका है तो इससे पर्यटक भी कैसे अछूते रह सकते है, उन्हें भी फुरसती की लत लगती है और सैलानी होने के नाते वो तो 20/- की मूंगफली ले बैठते है।
मेरे द्वारा किये गए एक और अध्यन ने ये भी बताया है की फुरसती जन्म देती है 'टोक' को जो हम युवाओ को फैशन करते समय बहुत झेलना पडता है। अब समय होगा तभी तो इंसान ध्यान देगा और ध्यान देगा तो अजीबो-गरीब फैशन पर टोकेगा भी ,मसलन कैटी आईज़ फ्रेम वाले चश्मे का फैशन लखनऊ में अब आया है जबकी सोनम कपूर इस चश्मे को पहन कर आइशा मूवी करके पीट भी चुकी है।हर ट्रेंड को यहाँ आने में समय लगता है जैसे ट्रेंड भी अपने आपमें  ये सोचता हो 'अमा जब फुरसत में आएँगे तब लखनऊ जाएंगे अभी बाकि के देश को कवर करो'।
वैसे इस फुरसत से याद आया हद होगई यार मुझे भी कितनी ज़्यादा फुरसत है।एक फालतू से सवाल के जवाब के लिए मैंने पुरे शहर का चककर लगाया ,लोगो को ताड़ा ,जगह-जगह की चाय पी मारी और जवाब मिला तो क्या फुरसत ! हद है यार न तो हम रिसर्च करने आए है न ही हमे इस काम के पैसे मिलने थे। तो हमने ये काम किया क्यों ? और आपलोगो की फुरसत का तो जवाब ही नही बस पढ़े जा रहे है लगता है लखनऊ का फुरसती कीड़ा मेरे कलम से आपके ज़ेहन में घुसता जा रहा है । जहा इतनी फुरसत मिली है वह थोड़ी और सही, समय निकालिये और आइये कभी पक्के पुल पे गोमती नदी की सफाई देखने ;)

2 comments:

  1. फुरसती होंगे तब ना आएँगे पक्के पुल

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