यु तो लोगो ने अपनी ज़िन्दगी की बाग-डोर उनको सौपी होती है जिनसे हम प्यार करते है। मिसाल के तौर पे माँ-बाप, भाई-बहन, या.....
खैर, आप समझदार है....
प्यार करने वालो पे तो सब भरोसा करते है,पर उनका क्या जिसने आपसे नफरत की है।
'अब की है तो की है, ये उनकी गलती है'
असल में ये किसी की गलती नही है, ये सिर्फ उस वक़्त के नज़रिये की गलती है। आप सिर्फ अपनी जगह से,अपने नज़रिये से उस व्यक्ति से हुए झगडे को देखते है, पर अगर आपलोग एक दूसरे की जगह ले ले तो.....मतलब उस झगडे की घटना को आप दोनों एक दूसरे के नज़रिये से देखे तो शत-प्रतिशत आप यही कहेंगे की " उसका भी कुछ हक़ है आखिर,
उसने मुझसे नफरत की है"
हर इंसान दुनिया में खुद को सही मानता है । दूसरे की ही गलती दिखाई देती है ।इस वक़्य पे एक मिसरा पेश है
" हज़ारो ऐब देखते है दुसरो के पहलुओ में
अपने किरदार में लोग फ़रिश्ते हो जाते है"
.
अगर मेरा भरोसा नही करना तो न सही ,आप भगवत गीता की मान ले..
गीत में ये स्पष्ट कहा गया है की 'द्रष्टा बन कर किसी भी परिस्तिथि को देखने से उसका हल ज़रूर मिलेगा' ( मतलब नजरिया बदल कर)
मेरा कोई ज्ञान देने का मन नही है।
बस लगा की जो लोग हमसे नफरत करते है , उन्हें ये बता दे की हम उनका भी ख्याल रखते है।
'आप सभी का हक़ है मेरी ज़िन्दगी पे ,आखिर आपसे झगड़ा कर के ,अपना दिल दुखा के मैंने बहुत कुछ सीखा है ,आपकी कमी हमेशा रहेगी ...आपने जो मुझे सीखाया वो तो मुझे प्यार करने वाले भी ना सीखा पाए।
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद
अगर मेरी ज़िन्दगी में वापस आना चाहते है तो आपका स्वागत है नही तो इस दुनिया में 7 बिलियन लोग है ...मैं उनसे काम चला लुंगी....
Friday, 24 April 2015
उसका भी कुछ हक़ है आखिर.....उसने मुझसे नफरत की है....।
Wednesday, 22 April 2015
"अकेले है तो"
सुबह 8:30 पर जब आप यूनिवर्सिटी पहुच जाए और अपने डिपार्टमेंट के आस-पास सन्नाटा पसरा देखे तो यही लगता है की इतना सन्नाटा क्यों है भाई!! ।ऐसे में आपका स्वागत सत्कार करने के लिए झड़ते पत्ते कहते है" बहारो पत्ते बरसाओ घर की खाली वेल्ली आई है" ।
अगर हैडफ़ोन न होता तो क्या करते। दिमाग की बत्ती जला पाना तो मुश्किल है पर शायराना दिल भी तो खली ही है ये कहता है।
"फुरसत से करेंगे तुझसे हिसाब ऐ ज़िन्दगी
अभी तो उलझे है हैडफ़ोन को सुलझाने में"
खली दिमाग कुछ भी कर सकता है। चींटियों को उसके घर जाने से रोक सकता है, यहाँ बाहर पड़े पाइप से मालिगिरि भी कर सकता है अगर आप ये सोच रहे है की क्या सच में मैंने ये सब किया है तो हाँ ये सच है।
अब क्या करे यार ये लेख भी तो इसी समय लिख रहे है।
हद है !!!अभी तक कोई नही आया!!!
पर एक शख्स आ चूका है!!!
अपना गरीब मास्टर मुकुल सर समय के पक्के.....पर वो भी बिज़ी है ,अपने काम में ....सुबह-2 क्या पकाऊ उनको!!! चलो जाने दो ।अपने-2 काम में लगो काहे इस वेल्ले लेख को पढ़नेे में लगे हो।
फिर से खेल शुरू करो
मुम्बई पल्टन बोले तो मुम्बई इंडियंस । जिनको कागज़ों पे सबसे बेहतर टीम का दर्जा प्राप्त तो है पर अब वो इतने महान बन गए है की खुद अपना खेल भूल गए है।
आई.पी.एल की सबसे बेहतरीन टीम अब सबसे बेढब टीम बन कर रह गई है। मेरा मन इनकी आलोचना करने का नही है। मैं तो बस इस कोढ़ का होमियोपैथी इलाज कर रही हु जो बीमारी को थोडा और विकराल करती है फिर जड़ से खत्म कर देती है।
प्रिय,
मुम्बई इंडियन, याद करो वो दिन जब रोहित शर्मा की कप्तानी में पिछले साल 2014 में राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ190 रन सिर्फ 14.2 ओवर में ही बना डाले थे क्योंकि प्ले-ऑफ फ़तेह करना था। आपके पास एक तरफ तो सचिन और जयसूर्या जैसी मज़बूत सलामी जोड़ी रही है तो दूसरी तरफ अम्बाती रायडू जैसे संवेदनशील खिलाडी जो अम्पायर दवारा गलत रन-आउट दिए जाने पर रो पड़े थे। आदित्य तरे!!!! वही खिलाडी जिसने आखिरी गेंद पे छक्का मार कर धोनी की याद दिलाई फिर जर्सी उतार कर दादा गांगुली की......
चलिए सब छोड़िये 2013 का फाइनल तो याद होगा जिसमे लसिथ मलिंगा ने धोनी जैसे फिनिशर को बांध दिया था पूरी टीम को कब्ज़े में ले लिया था ।
वो पोलार्ड की मस्तिया या यु कह ले गुस्ताखियां तो आप भूल ही नही सकते है जब मिशेल स्टॉर्क के पीछे बल्ला ले कर दौड़े थे!!!!
जहां आपने बड़ो को सम्मान दिया ,सचिन खेल नही पा रहे थे फिर भी उनकी महानता को समझते हुए आई.पी.एल की बोली में उनका बचाव कर अपने पास बनाए रखा यही नही जब वो रिटायर हुए तो उनके साथ 10 नंबर की जर्सी भी रिटायर कर दी।
उतार-चढाव ,सम्मान-आलोचना , इन सबकी भेट चढ़ा आपका सफ़र पर ये किसके साथ नही होता। याद करो वो समय जब अपने चाहने वालो के लिए एक-एक मैच पुरे जूनून के साथ खेल और जीता भी आपके खिलाडी सचिन तेंदुलकर के सम्मान में उनके आखिरी छक्के खाने वाली दर्शक दीर्घा को "सचिन तेंदुलकर स्टैंड' के नाम से नवाज़ा गया।
आपके लिए नामुमकिन कुछ भी नही आपका कप्तान रोहित शर्मा तो इतना महान है की अगर 1 गेंद पे 12 रन चाहिए तो वो छक्का मार कर पहले 6 रन जुटाएगा फिर उसका नसीब उस बॉल को नो बॉल करार देगा अब तो फ्री हिट मिल गई !!!!!!!!लगा देगा एक और छक्का ।
आप थोडा भूल रहे है अपने आपको ,अपना खेल फिर से शुरू कीजिये!!!
हम इंतज़ार कर रहे है!!!!
आपकी नफासत के कायल,
खेल दर्शक
Monday, 13 April 2015
हिंदुस्तानी तर्क ,वितर्क और कुतर्क
दे रखी हो .... हिंदुस्तान तक आते-आते बदल ही जाती है इसीलये शायद इसे अनोखा देश कहते है। जहा हर इंसान अपने अलग मायने ले कर चलता है। आज मेरा सौभाग्य था जो एक पेशे से डॉक्टर से मुलाकात हुई ।उनसे मैंने उनका नजरिया जानने की कोशिश की चूँकि वो डॉक्टर के पेशे से तालुक रखते थे "सेवा" पर उनके विचार लेने का विचार मेरे मन में आया.....
मुह में पान दबाए ,दवाई बनाते वक़्त दुआ पढ़ते हुए जनाब सयेद ज़ैदी जी ने हमसे पूछा की कहा तक पहुची पढाई और आगे क्या उद्देश् है आपका? ..... मैंने पूरी प्रभावी भाव के साथ बोला पत्रकारिता की पढाई कर रही हु ,पत्रकार ही बनना चाहती हु। अगला सवाल वो पूछे इससे पहले मैंने ही पूछ लिया "आपका क्या उद्देश् है"
डॉक्टर-'सेवा'
'कैसे'?
यही क्लिनिक में बैठ कर सबको दवाई दूंगा और क्या,
विचार अच्छा लगा पर जिस चीज़ के बदले आपको पैसे मिले वो कौनसी सेवा हुई ।बस इतना ही कहना था की वो मुस्कुराए पान थूका और बोले अगर मैं किसी हॉस्पिटल में बैठु तो एक बंधा हुआ समय मैं वहा दूंगा ,मरीज़ों को भी ठीक से समय नही दे पाउँगा, अकड़ के बात करूँगा और समय से 1 घंटा पहले निकल भी जाऊंगा,हो सकता है कोई -कोई दिन मैं जाकर अपनी ड्यूटी ज्वाइन भी न करू पर यहाँ अपना क्लीनिक है । मरीज़ आते है उन्हें पूरा समय देता हु ,प्यार से बात करता हु , उनका बीमारी को ले कर भ्रम को दूर कर आधा ऐसे ही ठीक कर देता हु ,पैसे होते है तो ले लेता हु नही होते है तो नही लेता हु । तो अब बताओ ये सेवा नही है क्या?
थोड़ी देर तक तो मैं उनको देखती रही पर फिर हाँ में मुंडी हिलाई!!!!!! ख्याल आया की ये तो व्यापारीकरण को बढ़ावा है अगर सेवा ही करनी है तो मुफ़्त में करे !!!!
'ये आजकल के पत्रकार भी न'
"बेटा ! मुफ़्त में इलाज करूँगा तो यहाँ लाइन लग जाएगी ,मैं घर भी नही जा पाउँगा!!!
इनके विचार सुन कर लगा की अब बस तर्क पर वितर्क हो गया है अब इस हिंदुस्तानी से कुतर्क मत करो वरना मेरी गुस्से से लाल मम्मी जो की दवाई ले चुकी है वह समय की कमी के चलते रोटी भी नही देंगी !!!
इस किस्से से एक बात तो साबित होती है " हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जहा हर 10 कदम पे सिर्फ संस्कृति ही नही विचार और परिभाषाए भी बदल जाती है"
Friday, 10 April 2015
ऐसे चले जब हवा.....इश्क़ हुआ ही हुआ...
कुछ न कुछ बात होने वाली है
या बहुत दूर जा चूका है कोई
या मुलाकात होने वाली है।
रात हुई और बात वही से बिगड़ गई । लोग परेशान हो जाते है जब उनसे पांच मिनट रुकने को कहा जाता है पर कुछ उस जैसे लोग बिना किसी बात के ज़िन्दगी भर इंतज़ार करते रहते है।
क्यों.....
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ ....क्या है .....
आखिर इस दर्द की दावा....क्या है...
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद...
जो नही जानते वफ़ा...क्या है....
जान तुम पर निसार करती है
मैं नही जानती दुआ...क्या है...
मैंने माना के कुछ नही ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा..क्या है...
एक आस,एक एहसास मेरी सोच और बस तुम
एक सवाल,एक मजाल,तुम्हारा ख्याल और बस तुम
एक बात,एक शाम,तुम्हारा साथ और बस तुम
एक दुआ,एक फ़रियाद,तुम्हारी याद और बस तूम
मेरा जूनून ,मेरा सुकून,बस तुम बस तुम।
अभी तक लिखी सारी बाते काल्पनिक है। इनका सत्य घटनाओ से कोई तालुख नही है ।पर हाँ सत्य घटनाए इन्ही बातो की वजह से शुरू होती है बस कुछ बदलावो के साथ
फिर जाग उठा है ...पुराने दिनों का दर्द
जी चाहता है ...फिर कोई ताज़ा शेर लिखू
बेहतर होगा अगर आप अपनी आस को अपने एहसास को अपने तक रखे वरना बहुत बुरा होता है ।ये सच है की मोहबत इज़हार चाहती है बार -बार चाहती है पर फिर कुछ माहौल ऐसा नही होता ....कुछ ऐसा हो जाता है....
सुनो
ज़रा सोचो
क्या गुज़रेगी दिल पे तुम्हारे?
तुम चाहो किसी को मेरी तरह
और फिर
कोई छोड़ दे तुम्हे तुम्हारी तरह!!!!!!!!!
Wednesday, 8 April 2015
झाड़ू
अच्छा चलिए ये बताइये की ऐसे कौनसी चीज़ है जिसके बिना आपका जीवन अधूरा है।.....नही.....नही वो झाड़ू नही है वो है स्वछता जिसके बिना आपका जीवन,हमारा भविष्य और ये दुनिया अधूरी है। ऐसे तो और भी कई चीज़े है मसलन पानी.... हवा...पर स्वछता भी इन्ही में से एक ज़रूरत है। तब ही तो हमारे प्रधान मंत्री माफ़ कीजियेगा हमारे प्रधान सेवक आजकल 'स्वछ भारत निर्मल भारत' के पिछे पड़े है वरना इतने बड़े देश के प्रधान मंत्री को अगर देश के और मसलो को छोड़ कर स्वछता पर ध्यान देना पड़े तो इससे ज़्यादा अहमियत की क्या बात हो सकती है। दिल्ली के मुख्यमंत्री तो झाड़ू की मदद से 67 विधायको के साथ चुनाव जीत कर बाकि सभी पार्टियो का सूपड़ा साफ़ कर दिखा चुके है और अब उसी झाड़ू से वहा की राजनैतिक गंदगी साफ़ करने में लगे है।.......
अब राजनेताओ ने तो इसका खूब इस्तेमाल किया है पर हम अपनी ज़िन्दगी में इसको दरवाज़ों के पीछे ,सोफे, तखत,या पलंग के नीचे पाते है। ऐसा ही कुछ काश हमारी ज़िन्दगी में होता जिसको हम अपने मन के दरवाज़ों के पीछे खयालो के सोफो,तखत या पलंग के नीचे छुपाते और लगभग हर रोज़ मौका लगने पर स्वछता अभियान चला कर उन बखेड़ो को निकाल बाहर कर स्वछ मन निर्मल मन का निर्माण करते।
ऐसा हो सकता है क्या......
हर किसी को ऐसा सोचना चाहिए और अपनी-अपनी ज़िन्दगी में उस झाड़ू को ढूँढना चाहिए जो न जाने अपने मन के कोने में छिपी हुई है ।इस वक़्त ये विषय दो तरफ इशारा करता है पहला तो आपके विचारो के शुद्धिकरण की दूसरी आपको चोट पहुचाने वाले लोगो की यादो के चले जाने पर शुद्धिकरण की । ये बहुत ज़रूरी है साँसो की तरह ज़िंदा रहने के लिए।
कितना कुछ सीखती है ज़िन्दगी में ये छोटी-छोटी चीज़े
ये जीने का मकसद बताती है रहने का तरीका सीखती है और कई बार तो मायने भी बताती है इन चीज़ों का ज़्यादा ज़ोर नही चलता या यु कहे इनकी यहाँ कोई अहमियत नही पर सच तो ये है की इनके बिना हमारी कोई ज़िन्दगी नही बिना झाड़ू के हमारा दिन शुरू नही होता है। ज़रा सोचिये तो अगर झाड़ू न होती तो क्या होता सारी धुल जमती चली जाती और बीमारियो का घर बन जाता हमारा घर .....ये हमें सेहतमंद भी रखती है ।
अगर कल्पना की बात करे तो लोगो ने झाड़ू को बड़ा चढ़ा कर अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाया है मिसाल के तौर पर विलियम शेक्सपिअर अंग्रेजी के महान लेखक (ड्रामा) ने अपने एक नाटक 'मेकबेथ' में अपने तीन पात्रो को झाड़ू की सवारी करवाई ये कह के की वो उड़ सकती है। बाद में इसी को आगे बढ़ाते हैरी पॉटर फ़िल्म के डायरेक्टर ने भी अपनी फ़िल्म को नया और आश्चर्यजनक बनाए के लिए झाड़ू का इस्तेमाल किया और और उनके जादुई स्कूल का एक विशिष्ट हिस्सा दिखाया। लोगोने इन दोनों ही जगहों पर इसके इस्तेमाल को सराहा है क्योंकि ये काल्पनिक थी और झाड़ू जैसी न अहमियत पाने वाली चीज़े में से एक थी।
ज़िन्दगी में बहुत से ऐसे पात्र है जो आपको बहुत कुछ सीखा सकते है बस ज़रूरत है थोडा सा ध्यान देने की और सीखने की छह रखने की । ये तो सिर्फ मेरे विचार मात्र थे। इनको पढ़कर अपने विचार बनाये और अपनी ज़िन्दगी सार्थक करे।