Thursday, 12 February 2015

शिकायतें

शिकायतें होने को तो किसी से भी हो सकती हैं .... किसी सरकारी कर्मचारी से या सरकार से किसी सामाजिक अभिशाप से या समाज से कभी कभी तो भगवान से बस फर्क ये है कि कोई उससे करता है तो कोई उसकी करता है ...... पर यहाँ मसला ये नही है कि दुनिया कितनी गलत है यहाँ मसला ये है कि आप कितने सही हो ........

यूँ तो हमने बहुत शिकायतें की हैं पर क्या हमने कभी दुनिया में नुक्स निकालने से पहले अपने अन्दर झाँका है क्यों ...... मुझे यकीन है कि आप सभी ने एक ना एक बार ऐसी कोशिश जरुर की होगी पर कुछ समझ में ना आया होगा अब यही बातें एक व्यक्तिगत नजरिये से समझने की कोशिश करते हैं....

“भरोसा मत करना इस दुनिया के लोगों पर, मुझे तबाह करने वाला मेरा बहुत अजीज था”
ये एक और नजरिया है किसी अन्जान शायर का इंसान को तबाह करने की ताकत इस दुनिया में किसी के पास नहीं है सिर्फ खुद उस इंसान के .... जब भी कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में जाता है तो उसे दूसरे व्यक्ति से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और उनको पूरा करने में रिश्ता अपने आप ही ख़त्म हो जाता है क्योंकि दोनों रिश्ते एक दूसरे से “थक” जाते हैं मेरी शिकायत इसी अपेक्षा से है ...... ना किसी से कोई अपेक्षा रखो ना कोई रिश्ता बर्बाद हो और ना ही किसी की ज़िन्दगी तबाह हो पर इसका एक और मतलब है कि कभी किसी को अपने इतना करीब भी मत आने दो कि ज़िन्दगी उसके अधीन हो जाए .....

अब इसी बात को समझाते हुए किसी नामचीन पर मेरे जहन में अन्जान शायर ने कहा है जो कि स्वर्ण अक्षरों से अंकित है मेरे जहाँ में कि “प्यार भी बड़ी अजीब चीज़ होती है, एक थक जाए तो दोनों हार जाते हैं..” एक शिकायत खुद से करो कि क्यों किसी के आने या जाने से मुझे फर्क पड़ता है... ये ज़िन्दगी एक यात्रा है जिसमे कई आएँगे और कई जाएँगे पर सफ़र यूँ ही चलता रहेगा और एक फैसला भी करो ....

अगर कभी किसी के होने से फर्क पड़ता है तो उसे एक किताब की तरह समझो क्योंकि किसी भी वक्त ये फैसला करना पड़ सकता है कि “पृष्ठ बदलना है या किताब बंद करनी है”
अब आइये एक और नजरिया देखते है ये एक अन्जान शायर ने कहा है कि “हमे शौक है इतना फरेब खाने का देख ही नहीं सकते असल रुख जमाने का” इनसे थोडा इत्तेफाक रखा जा सकता है क्योंकि सच में ज़माना हद से ज्यादा बदल गया है .... पहचानिए वरना शिकायतें करते रह जाएँगे और जमाना और भी आगे निकल जाएगा ... अपने हर सवाल को उठने दीजिये और उसका जवाब ढूढिये ...

शायद यही तरीका है खुद को तबाह होने से बचाने का .....
यूँ तो मुश्किल है किसी को भुलाना पर फिर भी याद रखे और इनकी बात को अपनाएं ... “सारी दुनिया के रिवाजों से बगावत की थी याद आता है हमने भी कभी मोहब्बत की, चैन से रहिये और राहत इन्दौरी साहब की बात गौर से सुनिए और सुनाइए ... ये कहते हैं कि अकेले रहने का भी अलग सुकून है ना किसी को पाने की चाह है ना किसी को खोने का डर”
अरे ! कभी तो पतंग उड़ाने का सुकून लीजिये जरुरी है कि पेंच लड़ाए जाए ... हवाओं का रुख देखिये इससे पहले तूफान आए अपनी पतंग को जमीन पे ले आइये ...

-    राजसी स्वरुप

2 comments:

  1. good one ..kaafi accha likha hai RAJSI likhti raho ....

    ReplyDelete
  2. दर्द हमेशा अपने ही देते हैं ...वरना गैरों को क्या पता की हमे तकलीफ़ किस बात पर होती है ।

    ReplyDelete