Wednesday, 18 February 2015

चप्पलिया दोस्ती

जी जनाब....
बड़े सवाल आए  होंगे मन में इस शीर्षक को पढ़ने के बाद ......,होना भी चाहिए जी .... ज़रूरी है । 'चप्पलिया' मतलब चप्पल । बात बहुत सीधे तौर पे एक किस्से से जुडी है । जो अभी कुछ घंटो पहले ही घटित हुआ था। इस किस्से ने हमे कुछ देर की मौज दी पर मुझे बहुत कुछ सीख दिया । तो हुआ यु की लखनऊ विश्वविद्यालए के मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के सामने हम अपने दोस्तों के साथ चक्कलस काटने में मसरूफ़ थे । इतने में याद आया की अपनी ज़िन्दगी का खुद से भी ज़्यादा ज़रूरी हिस्सा मेरा एंड्राइड फोन क्लास में ही छूट गया । बस फिर क्या था आनन-फानन में भागना  शुरू किया जैसे की ट्रेन छूट रही थी ............. भागते-भागते क्लास तक पहुचे ही थे मतलब ट्रेन पकड़ी ही थी की चप्पल ने साथ छोड़ दिया ....... अब लगा ये ज़्यादा बड़ी मुसीबात हो गई .....ख़ैर! अब पसांगा पला है तो झेलो और बनो पि.टी.उषा ....उतने में याद आया की स्टाफ रूम से सेफ्टी पिन ले लू । सुरभि मैम को ढूंढ सेफ्टी पिन लिया लगाया फिर निश्चिन्त हो के कैंटीन की ओर फिर चक्कलस करने को बढ़ लिए ..... अब है तो एक सेफ्टी पिन ही कितना साथ देगी .....उसने भी दम तोड़ दिया ....फिर क्या था किसी तरक घसीटते -रगड़ते दोस्तों तक पहुच गए । वह मिली विश्वास से ओत-प्रोत पूजा जिनके हिसाब से इस चप्पल को जुड़वाने के लिए मोची के पास न जा कर यही ठीक करेंगे क्योंकि इसमें किक है.......
और मिली निधि ,कोमल जिनको थोड़ी सान्तवना थी की अब 'क्या होगा' पर उस वक़्त मुझे एक चाडक्य की ज़रूरत थी जो एक सही जवाब दे सके ....
बैरहाल ! किसी तरह हम सबने सोचा की बैंक के पास से आल पिन या पेपर पिन का इंतज़ाम किया जाए और किया भी गया ..... बस यही है दोस्ती वरना किसी को क्या पड़ी थी मेरी और मेरी चप्पल की......
          पिन ढूंढ के लए पर कुछ न हुआ फिर थोडा मोची की तरह सोचा आल पिन को कील की तरह इस्तेमाल किया अब हथौड़ा कहा से लए तो लाल  ईटा दिखा उससे कोशिश की ......अब मज़ेदार बात तो ये है की हम लोगो को ऐसा पागलपन करते हुए पूरा इलाका देख रहा था | सब सोच रहे थे की ये लडकिया क्या कर रही है।
   वो कहतेहै न देने वाला छप्पर फाड़ के देता है । मैंने एक चाणक्य माँगा था भगवान् ने चाणक्यओ की टोली भेज दी ..... वहा हमारे क्लास के लड़के सुशील, आकाश, रबिंशु, ज़करिया, और आश्विन आ पहुचे पूछने पर  हम लोगो ने बताया की क्या हुआ फिर तो साहब कोशिशो की झड़ी लग गई । ये सुनने में बड़ा अच्छा है पर इस चप्पल तोड़ किस्से ने मुझे मेरी अहमियत का ज़ाइका दिया वरना अब इतने लोगो को क्या पड़ी थी मेरी या मेरी छापल की......
बड़ी देर कोशिश की जनाब पर चप्पल न होगई घर का दामाद हो गई बिलकुल नाराज़ जुड़ने को तैयार ही नही फिर क्या था हार कर आश्विन बोला की मेरी गाडी यही कड़ी है और चाभी मेरे पास है ...... चलो ! छापल से माथा -पच्ची अब मोची को ही करने दो ।.......
         अब मोहौल शांत हुआ मेरी चप्पल कांड का जवाब  मिल गया  । इलाके में शांति हुई और सब कट लिए......
    कोशिश नाकाम ज़रूर हुई पर मेरी अहमियत और इन सबका प्यार मैं आप सबसे बाटे बिनक न रह पाइ । यु तो ज़िन्दगी में बहुत कुछ घटित हो जाता है पर इसका आंकलन कोई नही करता  अगर करना शुरू कर दे तो आप असल माइनो में अपडेटेड केहलाएंगे .......
        शुक्रिया दोस्तों तुम सबके साथ का और इस चापलिया दोस्तीकी खास याद का.........

1 comment:

  1. दोस्त आप कि कहनी बहुत दिलचस्ब है

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