एक बहुत भरी सा , सबसे ज़्यादा सुनाई देने वाला पर बेहद "shortage" वाला शब्द "भरोसा"
सुन कर लगता है जैसे इसके बिना दुनिया न चलेगी और सच भी है नही चल सकती पर आज कल का युवा जितने दंद-फंद न मचाए सो कम है | इस पीढ़ी ने तो इस शब्द का मतलब ही बदल दिया है | माना की में भी इसी पीढ़ी की हु पर थोड़ी से रूढ़िवादी हु कुछ शब्दों को लेकर जैसे "प्यार" ,'मेरे लिए प्यार का मतलब प्यार होता है ,पर आजकल प्यार का मतलब खेल होता है '| .......
अगर आप किसी अनजान से मिलते है चाहे फेसबुक पे ,या क्लास में, या ऑफिस में तो "वो" आपको जानने की कोशिश करता है फिर समझने की कोशिश करता है (पहले के ज़माने में तीसरी स्टेज प्यार होता था और अब खेल होता है) फिर वो अपना खेल शुरू करता है| आपके भोलेपन का बागपन का फायेदा उठता है | थोडा फ्रैंक ज़्यादा फ़्लर्ट करता है | आपको पूरी तरह "भरोसे" जैसे शब्द के आस- पास नचा के रख देता है | जिसको आप अपना भरोसेमंद समझ कर सब बता रहे है वो आपके भरोसे से खेल रहा है और आप बाद में कहती है .........."आई ट्रस्टेड हिम".....!!!!!!
ऐसे खेलंदरो से बचने का एक ही तरीका है | इस "भरोसे" जैसे शब्द की ऐसी परिभाषा को अपनाओ जो लेटेस्ट हो , जो आपके मम्मी -पाप के ज़माने से चली आ रही है वो नही |
ऐसे आप खुद भी बच जाएंगे और आपका महौल भी ............अपनी ज़िन्दगी के शब्द कोष को ऑक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी की तरह अपग्रेड करते रहो तो दुनिया में आप सेर होंगे और आपका सवा सेर कोई न होगा ......वैसे अगर आप ऐसे किसी "भरोसे" के चक्कर में आ चुके हो तो कोई बात नही इसे पूरी शालीनता से मानो कि "हा मेरे साथ खेल हुआ है और अब ऐसा न हो इसलिए मैं सतर्क रहूंगी क्योंकि इंसान तो गलतियों का पुतला है " और बाबा आमिर खान जी ने भी 3 इडियट्स में कहा था कि "मेक योर ओन मिस्टेक्स" तो गलतियां करते रहो और सीखते रहो बस कोशिश करके उन गलतियों को दोहराओ नही .........
अब बैठे क्या हो उठो और अपनी डिक्शनरी अपग्रेड करो ............
सुन कर लगता है जैसे इसके बिना दुनिया न चलेगी और सच भी है नही चल सकती पर आज कल का युवा जितने दंद-फंद न मचाए सो कम है | इस पीढ़ी ने तो इस शब्द का मतलब ही बदल दिया है | माना की में भी इसी पीढ़ी की हु पर थोड़ी से रूढ़िवादी हु कुछ शब्दों को लेकर जैसे "प्यार" ,'मेरे लिए प्यार का मतलब प्यार होता है ,पर आजकल प्यार का मतलब खेल होता है '| .......
अगर आप किसी अनजान से मिलते है चाहे फेसबुक पे ,या क्लास में, या ऑफिस में तो "वो" आपको जानने की कोशिश करता है फिर समझने की कोशिश करता है (पहले के ज़माने में तीसरी स्टेज प्यार होता था और अब खेल होता है) फिर वो अपना खेल शुरू करता है| आपके भोलेपन का बागपन का फायेदा उठता है | थोडा फ्रैंक ज़्यादा फ़्लर्ट करता है | आपको पूरी तरह "भरोसे" जैसे शब्द के आस- पास नचा के रख देता है | जिसको आप अपना भरोसेमंद समझ कर सब बता रहे है वो आपके भरोसे से खेल रहा है और आप बाद में कहती है .........."आई ट्रस्टेड हिम".....!!!!!!
ऐसे खेलंदरो से बचने का एक ही तरीका है | इस "भरोसे" जैसे शब्द की ऐसी परिभाषा को अपनाओ जो लेटेस्ट हो , जो आपके मम्मी -पाप के ज़माने से चली आ रही है वो नही |
ऐसे आप खुद भी बच जाएंगे और आपका महौल भी ............अपनी ज़िन्दगी के शब्द कोष को ऑक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी की तरह अपग्रेड करते रहो तो दुनिया में आप सेर होंगे और आपका सवा सेर कोई न होगा ......वैसे अगर आप ऐसे किसी "भरोसे" के चक्कर में आ चुके हो तो कोई बात नही इसे पूरी शालीनता से मानो कि "हा मेरे साथ खेल हुआ है और अब ऐसा न हो इसलिए मैं सतर्क रहूंगी क्योंकि इंसान तो गलतियों का पुतला है " और बाबा आमिर खान जी ने भी 3 इडियट्स में कहा था कि "मेक योर ओन मिस्टेक्स" तो गलतियां करते रहो और सीखते रहो बस कोशिश करके उन गलतियों को दोहराओ नही .........
अब बैठे क्या हो उठो और अपनी डिक्शनरी अपग्रेड करो ............
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