Friday, 15 February 2019

आखिर.......शादी कब करनी चाहिए?

आखिर.......शादी कब करनी चाहिए?

बचपन का सपना पूरा करते-करते कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला, और आज इतने बड़े हो गए हैं कि सपना पूरा करने से थोड़ी ही दूर है. लेकिन, न जाने कब इस सपने के पीछे इतने बड़े हो गए की माँ-बाप की नज़र में शादी के लायक बन गए. अब तो खानदान में मुझसे बड़ी कोई बहन भी नहीं बची जिसकी शादी के पीछे सबकी नजरें टिकी हो. न जाने कब मेरे माँ-बाप से लोग मेरे स्कूल का रिपोर्ट कार्ड छोड़ कर मेरी शादी की तारीख पूछने लगे. इतनी जल्दी, इतना कुछ हो गया? और मैं तो अभी तक उस उंचाई तक पहुँच भी नहीं पाई, जहाँ का सपना मैंने बचपन में देखा था. अब एक बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि “सोसाइटी” के हिसाब से मेरी उम्र हो चुकी है. इसलिए मेरे माँ-बाप भी यही चाहते हैं, पर मैं क्या चाहती ये कब और कहाँ तक फर्क ला पाएगा? इसके लिए मेरा ये जानना बहुत जरूरी है कि आखिर.... शादी कब करनी चाहिए?


मैं शर्त लगाती हूँ कि 4 वेद, 18 पुराणों में भी इस सवाल का जवाब नहीं मिल सकता. क्योंकि इसका जवाब हर एक इंसान के लिए अलग-अलग होता है. और आजकल के ज़माने में इस सवाल का जवाब ढूँढना मुश्किल नहीं हैं. जब मैं इस सवाल के जवाब की खोज करने निकली, तो मुझे पता लगा की ज़रूरी क्या होता है? मन की तैयारी. जब आपका मन तैयार हो आपको शादी कर लेनी चाहिए, पर उस हिसाब से तो मैं बचपन में ही तैयार थी जब हिंदी मूवी “ जब वी मेट” का डायलाग फेमस हुआ था. अरे वही वाला “मुझे तो बचपन से ही शादी करने का बड़ा शौक है बाई गॉड”. उस मूवी को सिनेमा हॉल से उतरे 10 साल से ज्यादा हो गया है. मेरा बचपना भी जा चूका है और मुझे अब शादी करने का कोई शौक नहीं है बाई गॉड. पर ये बात माँ-बाप को कौन समझाए? इस कशमकश में हर कोई अपनी ज़िन्दगी में एक न एक बार ज़रूर उलझा है. और दूसरों का पता नहीं पर मैं ज़रुर इस मुसीबत से सबसे अच्छे से निपटना चाहती हूँ.

वैसे तो माता-पिता के लिए उनके बच्चे हमेशा छोटे ही रहते हैं. पर बच्चे की उम्र 23 होते ही माँ-बाप की सोच “कोम्प्लेन” पी लेती है. तो चलिए आपको वर्ल्ड वॉर थ्री से भी बड़ी समस्या का हल बताते है. तो सबसे पहले एक ज्ञान फिर उसका व्याख्यान:

“अक्सर लोग शादी करने के फैसले को लेकर कई बातें मन में बैठा लेते हैं, जिसकी वजह से वो “स्टुपिड” रीज़न से शादी करने का फैसला कर बैठते हैं. जैसे मुझे शादी कर लेनी चाहिए क्योंकि मेरे सारे दोस्तों की शादी हो चुकी हैं और रिलेटिव्स के ताने सुन-सुनकर कान थक चुके हैं. सच तो ये भी है कि अब अकेले वैलेंटाइन्स डे मनाने का मन नहीं करता. माँ-बाप का कहना भी तो सही है आखिर छोटी बहन की शादी कब होगी अगर मैंने अभी नहीं की तो. सुना है मेडिकली भी माँ बनाने के लिए अभी की उम्र सही है, वर्ना आगे प्रॉब्लम्स आती है. अब एक्स ने भी तो शादी कर ली है, तो चलो मैं भी कर ही लेती हूँ.”

हम जैसे कई लोग अपनी इस सोच के कारण शादी कर बैठते हैं. अब अगर सही मायनो में समझा जाए, तो शादी इन कारणों से नहीं करनी चाहिए. बल्कि तब करनी चाहिए जब इन में से कोई कारण आपको प्रभावित करना बंद कर दे! जब आपका मन कहे कि अब कर लेनी चाहिए. उम्र का कोई भी पड़ाव आपको इतना परिपक्व नहीं बना सकता कि आप शादी जैसी बड़ी जिम्मेदारी को संभाल सके. बस आपको अगर कोई तैयार कर सकता है तो वो है आपका मन, बाकी तो जैसी जिसकी श्रद्धा.


करने वाले तो शादी करने के बाद भी ज़िन्दगी में बहुत कुछ कर गुज़रते हैं, जैसे अमिताब बच्चन, हृतिक रोशन. वहीं, कई लोग शादी के बाद बर्बाद भी हो जाते हैं, जैसे ऐश्वर्या राय, मोहम्मद शमी. कई लोग सिंगल रहकर भी कमाल कर लेते है, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ अब्दुल कलम आजाद और कई लोग न शादी करके अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर लेते हैं जैसे सलमान खान. खैर ये तो बहुत बड़े बड़े लोगों की बात हो गई पर लड़कियों की बात करे, तो उनका मन से तैयार होना और ज़रूरी है. क्योंकि न जाने कब उनको अपनी डिस्टिंक्शन वाली डिग्री से रोटियाँ लपेटनी पड़ जाए या गोल रोटी बनाने वालों को फाइल्स थमा दी जाए. जय हिन्द!


Tuesday, 19 July 2016

मेरे चाय की चरस जिन्होंने बोई!



Let’s start with the date 17/7/16 क्योंकि पुरानी बातें मैं करती नहीं।  जो होगया सो होगया, रात से तैयारी कर रही थी, एक विशेष काम की, रात 2 बजे पता लगा कि पासपोर्ट की ज़रूरत है, उसके बिना रजिस्ट्रेशन भी नहीं होगा, जूनून इतना था कि रात में ही पासपोर्ट तक अप्लाई कर दिया पर मेल नहीं आया।  सुबह 7  बजे का अलार्म भी लगाया, सोचा अगर सुबह तक मेल आ गई तो भी काम चल जाएगा,  मतलब बात की गहराई को समझ रहे है न आप, बिलकुल पक्के क्रिकेट फैन की तरह अब ज़िंदगी में पेश आना शुरू कर दिया है, जैसे आखिरी बॉल पर 8 रन चाहिए हो तब भी लगता है कि नो बॉल होकर छक्का पड़ेगा फिर 2 रन लेकर इंडिया जीत जाएगी।  खैर, वो जो भी हो अब ज़िन्दगी है तो उम्मीद तो होगी ही।  जैसे-तैसे 7 बजे अलार्म से पहले आँख खुली देखा मेल नहीं आया ( अब ये ज़िन्दगी है क्रिकेट थोड़ी न है और न ही मैं एमएस धोनी  हूँ), बिना कुछ सोचे मैं दुबारा सो गई उठी 1 : 30 , "अब तो दिन मज़े से पार होगा बस हमदोनो और कोई नहीं( मतलब मैं और निधि)" लेकिन किस्मत पर बट्टा अभी खत्म नहीं हुआ था कि निधि के ऑफिस से  फ़ोन आया और उसे संडे को भी बुला लिया गया।  मुझे लगा आज जो न हो वो कम है।  वो चली गई और मैं अपनी पसंद की ड्रेस पहन के घर से निकल आई, यह सोच कर की आज कुछ तो करेंगे, इस दिन को यूँ ही घर पर बिता कर बेकार नहीं करेंगे।  मेट्रो पहुंच कर सोचा दाए या बाए, तो रोज़ वाला राइट ले लिया, फिर इंटरचेंज तक कुछ सोच नहीं पाए कि क्या करे ? तो फिर से रोज़ वाली लाइन चेंज कर ली, मतलब बात की गहराई को समझ रहे है आप वही क्रिकेट फैन वाली हिम्मत नहीं हारते चाहे कुछ हो जाए।
देखते ही देखते स्टेशन दर स्टेशन आ रहे है, माफ़ी इस अपमानजनक शब्द के लिए पर साला  आज मेट्रो कुछ ज़्यादा ही जल्दी चल रही थी, तो दुबारा माफ़ी पर साला जल्दी-जल्दी सोचना भी तो पड़ रहा था, एक बात दिमाग में आई , क्यों न आज वहा चलते है जहां से सफर की शुरुआत की थी, मतलब वो जगह जिसने मेरी यहाँ घूमने-फिरने की लत लगवाई थी।  न, न, जीआईपी नहीं  'टीएस्टा' खुले शब्दों में कहे तो टी प्रोफेशनल्स।  पहले इनका परिचय करवा दूँ।  ये 1996 से यहाँ के लोगो की सेवा कर रहे है, इनका नाम है कैपटन वी. के मेहरा, ये आर्मी से 1968 में सेवा मुक्त हो गए थे, जिसके बाद असम और वेस्ट बंगाल की सर्वोपरी चाय बाग़ान  में इन्होने काम किया, चाय की सभी तरह से जानकारी हो जाने पर इन्होने नॉएडा सेक्टर 37 में अपनी निजी चाय की दूकान खोली जिसमे इनकी अर्धांग्नी ने भी इनका साथ दिया,  इनके यहाँ चाय के सभी स्वाद प्रत्यक्ष असम  वह वेस्ट बंगाल से आए है, इसलिए यहाँ के लोगो को इनके जैसा स्वाद कही नहीं मिलता, जिसमे से मेरी पसंदीदा मसाला चाय और कश्मीरी कहवा साथ में चिकन सलामी सैंडविच और चिकन मोमोस तो और भी कही नहीं मिल सकते।  इनके यहाँ हर चीज़ ऐसे लगती है जैसे दिल से बनाते हो।
अमीर और बिगड़े हुए लोगो की यहाँ कतार रहती है, जैसे जब ये लोग घर पर होते है तो बड़ी चाय पी ही लेते होंगे। अब नखरे है भाई! जिसको दिखाने वाले भी महान है, और उठाने वाले भी महान है।  बीएमडब्लू और हार्ले तो यहाँ आम गाडी है तो रॉयल एनफील्ड बिखरी पड़ी है।
मेरे ख्याल से इतनी तारीफ  काफी होगी, बाकि आप खुद समझदार है।  कहने वाले तो ये भी कहते है कि यहाँ ड्रग्स, अल्कोहल और सिगरेट बहुत ही आसानी से मिलती है, पर एक बात बता दूँ जो लोग ये बात कहते है ना, वो यहाँ आते नहीं है। 

मेरे इस सफर की यही तो खास बात है कि ज़िन्दगी हो या खेल, मैं एक फैन की तरह ही पेश आती हूँ।  कभी धैर्य नहीं खोती, जैसे आज नहीं खोया।  देखा जाए तो ये बहुत बुरा था जो बीता, वो भी लगातार दूसरी बार चुने जाने के बाद सपना टुटा, पर ये टी-  प्रोफेशनल्स हमेशा अपनी चाय से मेरा मन भर देते है, फिर चाहे मैं दुखी हूँ या खुश।
आज बहुत दिनो के बाद यहाँ आई, अकेले एक बार फिर से, उस टूटे हुए सपने का जश्न मनाने बिलकुल वैसे ही जैसे मोहम्मद रफ़ी कहते है. . . . . . . .

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया 
हर फ़िक़्र को धुंए में उडाता चला गया 

बर्बादियों का सोग मनाना फ़िज़ूल था 
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया 

जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया 
जो खो गया उसीको भूलता चला गया 

गम और ख़ुशी में फर्क न महसूस हो जहां 
मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया

Thursday, 14 April 2016

अब क्या लिखूँ

लिखते रहिये की लिखने की काबिलियत लेखनी के इतिहास में लेखको को अमर कर देती है।
पर रोज़-रोज़ ये कर पाना कहा तक संभव है, हर रोज़ की नई कशमकश और उनसे जूझते ख्याल मन को हिलाने का काम तो बड़ी आसानी से करते है पर उनको लिख के बयां करने का काम इतना आसान भी तो नही है।
हर रोज़ के इस झगडे का समाधान यही है कि बस लिखने बैठ जाओ, जो मन में आए , जहा तक ये कलम ले जाए ,उसके साथ जाओ ,कोशिश करो की आज लिखने का कोई मुद्दा न मिले न राजनीतिक, न खेलनीतिक ,सबकुछ आकस्मिक हो ,पूर्णतया खयालो से जुड़ा और जिस मुद्दे को लिखने बैठे हो वहा से भटको भी न।
हर बार ये दिमाग के घोड़े जब दौड़ते है तो अनंत तक जाते है , आज कलम के घोड़े मुझे ले जा रहे है तो वहा जाने का मन नही कर रहा ।
अमा अजब झगड़ा कर रखा है तुम लोगो ने .....
आज जिन मसलो पर तुम बात करना चाहते तो उनपे ये लिखने को तैयार नहीं, जिन मसलो पर ये लिखने को तैयार है उनपे तुम सोचने को तैयार नहीं, फैसला क्यों नही कर लेते तुमदोनों की आखिर बात क्या है।
हर किसी के अंदर रोज़ यही झगडे होते हैं। इस बीच एक लेखक खो सा गया है, मुझे उम्मीद है ये इसी स्याही में दब के मर भी जाएगा और स्याही का गहरा नीला रंग ऊपर से लेखक की लाश को पहचान में भी नही आने देगा ,बिना 3 फ़ीट का गड्ढा किया एक लेखक दब-दब कर अपने आपको दफ़न कर लेगा
आज के लिए इतना लिखना बहुत है।
जय हिन्द।

Wednesday, 17 February 2016

तुम ऐसी ही कोशिश करना

ऊची -ऊची इमारते चलती  फिरती ज़िन्दगी, इससे मुझे कोई मुसीबत नही है आखिर यही विकास होता है, इससे नफरत करके एक जगह ठहर जाने की बेवकूफी मुझे नही करनी और ऐसी कोई बकवास भी नही करनी जिसपे कोई कार्यवाही करने के लिए तैयार न हो, ऐसे ख्याल भी अब बोर करने लगे है।

                                                    दिल्ली  मेट्रो  के  लाइन  में खड़े  होना ,फिर जल्दी-जल्दी भाग के मेट्रो पकडना, वहां अपने आपको एक मज़बूत, लडने को तैयार और हर वक़्त जूझारू बने रहने के जज्बातों से लबरेज़ महसूस कर अच्छा लगता है, आखिर लाख गालीयाँ सुना लो इस दिल्ली शहर को पर इतना भरोसा खुद पे जमने के पीछे का कारण यहां के भागते दौड़ते हालात ही है।  ये बदलाव लखनऊ कभी न ला पाता, ना  ही हमे इस काबिल बना पाता की माँ बाप से इतर कही और गुज़र-बसर करने की  सोचते, ये कड़वी गोली दिल्ली के हाथों ही खानी थी, सो खाई पर अब तो इस गोली का स्वाद  कड़वे से खट्टा लगने लगा है थोड़ा सा आचार मिला के जो खाने लगे है हम, इन मुद्दो पर बात-चीत का सिलसिला तो फिर कभी चलाएंगे ,अभी बात कहने को कुछ और भी ज़रूरी है और वो है बदलाव सुना है पिछले 5 सालो में दिल्ली बहुत बदल गई है इनका हाव भाव , बनावट वगैरह-वगैरह..........पर अब वो महक यहां की  गलियो से नही आती । लेकिन कई मामलो में दिल्ली आज भी उसी जगह खड़ा है जहाँ उसे होना चाहिए था जैसे देश की राजनीति,  खेल,हलचल  और शहरों के मुकाबले इसने अपने आपको बहुत सहेज है ,संभाला है।
                                          लखनऊ तुम भी ये अदा दिल्ली से सीखना।  अब मेट्रो, अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम बन जाने के बाद एक अलग आंधी भाग दौड़ तुम्हे देखने को मिलेगी ,जहाँ लोग ठहरेंगे ही नही।  एक दूसरे को सलाम करने की ज़ेहमत तो छोड़ो रुक के मुस्कुराने तक का समय भी नही होगा पर तुम हिम्मत मत हारना, तुम्हारे जो पुराने मोहोल्ले है उनकी तरफ देखना , उन्होंने  ही दिल्ली को बचाया है और वही तुमको बचा लेंगे फिर भी अगर काम न बने, सब कुछ अपने हाथ से निकलता हुए दिखे तो मैं हूँ ना मैं या मेरे जैसे और लोग जो लखनऊ से दूर कहीं और रह रहे है वो आ कर इस सभ्यता को बचा लेंगे क्योंकि हमारे जैसे लोग ही  तुम्हारे इत्र से महरूम है और उसको कितना याद करते है ये हम या हमारे जैसे लोग ही बता सकते है तुम्हारी बोली आवाज़ सुनने  को तरस गए है ,इस वक़्त हम उन्ही देश भक्तो के जैसे महसूस कर रहे है जो स्वदेश से दूर अपने देश को दिल में बसाए अपनी ज़िन्दगी जी रहे है और मौका पड़ते ही कई सारे किस्से फुटकर में दुसरो को सुना रहे है।  

Sunday, 24 January 2016

Bollywood in 2015

After saying Happy New Year Bollywood plans to gave a surprise to the audiences by releasing one by one suspense thrillers but some plans are not meant to be successful ,as happened again audience itself  gave a surprise a much known deficit to the box office collection
from January-march only dum laga ke haisha(which is of course not a suspense thriller) and NH10   pressurised audiences to come and join them others were just busy in creating tacit love story with the loss they have
april-june generally came up with a same weather conditions but Bollywood got a drastic change and this time they tried entertainment but there trending modern history smashes the whole  scenario of there dream collections. some movies like Piku, tanu weds manu return, dil dhadhakne do, humari adhuri kahani & ABCD 2 grabs there positions in which tanu weds manu return should be clearly concider as 'king of words' those dialogues and songs creates a whole new world to stay and enjoy but others like detective byomkesh bakshi , dharam sanket mein, bombay velvet & gabbar is back  can't even stand for a week when compared to there expected ratio of delivering and serving the audiences , before compiling this quarter it would be an honour to say that this quarter at least have a point  to stay in peoples mind because of the movie margarita with a straw it actually pressurise your mind to think
once again repeatedly it became difficult to understand the actual issue or the mindset of audience so the movie makers tried it even harder but only kabir khan have got the chance to shout eureka! after the release of bajrangi bhaijaan the only formula to get a hit is salman khan . bhaijaan's way  of kindness in the movie melts people's heart but that was just a break, 2015 got its first block buster .
our fearless directors tried to go for some experiments like masaan, drishyam,manjhi but they ended up being tagged as an average
as previously said by Shakespeare 'uneasy lies the head that wears the crown'  same happened with salman khan he produced hero which tied the audience so tightly that they can't even breathe properly . well its not the end yet katti batti ,msg-2 kiskisko pyaar karu cannot be ignored cause they actually gave trauma whomsoever tried to watch them.
if you get disheartened by these comments then you can try watching any of them . all in all this quarter can also be called as 'the regret'
lights,camera,action,blockbuster but for mindless people which means again entertainment .the golden period of 2015 is assumed to be there .now the real  tom and jerry kinda fight ends itself . in last quarter the directors and audiences were fed up with this deficit in collection.
cheers to Singh is Bling, pyaar ka punchnama-2, prem ratan dhan paayo, Bajirao mastani &dilwale . the actual golden blockbuster period with a supernatural clash . here people witnessed the real class of Bollywood with Bajirao mastani and new avatar of  rohit shetty with much awaited on screen couple shahruk and kajol. kudos to there collection but a deep silence on there work , on the other side of the coin jazba, talvaar, shandaar, angry Indian goddess & hate story-3  termed as average but on a personal note it is important to flash that  the movie for which audiences was not ready is tamasha. it was critically acclaimed but became a fail experiment. actually director imtiaz ali is a genius but not a millionaire yet again.

Friday, 18 December 2015

Feeling 99% downloading

जब-जब 99% डाउनलोडिंग का दृश्य देखने को मिलता है तब-तब दिल की धड़कने किसी इलेक्ट्रिक इंजन वाली रेलगाड़ी से भी तेज़ भागने  लगती है। ऐसा लगता है जैसे मिस्बाह-उल-हक़ बैटिंग पे खड़ा है,उसे सिर्फ 4 रन चाहिए आखिरी बाल है और बोलिंग जोगिन्दर कर रहा है(ये उपमा उन लोगो के लिए दी है जो 99% डाउनलोडिंग के डर से कभी नही गुज़रे.......!) जनाब ऐसे ही हालात होते है, जब दिल सीने में नही मुह तक आ कर धड़कता है।वैसे इस समस्या की एक अच्छी बात होती है,ऐसे हालातो का सामना आपको सिर्फ 1 या 2 मिनट के लिए ही करना पड़ता है फिर या तो छक्का पड़ता है या बल्लेबाज़ आउट हो जाता है मतलब फ़ाइल 100% डाउनलोड हो जाती है या फिर error लिख के आ जाता है। ख़ुशी इस बात की है की हर बार भगवान् इतना दयावान हो ही जाता है की दिल का दौरा पड़ने से पहले एक पडला भारी कर देता है।
              आज मेरे दिमाग में ये ख़याल इसलिए आया क्योंकि मैं आपको नही बताना चाहती की मैं भी इन्ही हालातो से गुज़र रही हूँ । अब ये मैं बिलकुल नही बताउंगी की मैं इतनी बुरी तरह से ग्रसित हूँ की मेरा ये समय 1 या 2 मिनट का नही बल्कि 4-5 दिन लम्बा खिच गया है पर उम्मीद के आलावा मेरे पास कोई चारा नही, ऐसे नही है की मैं इंसान ही असामर्थ्यवान हूँ लेकिन मुझे ये दिन काटने ही पड़ेंगे । बिना किसी गंभीर चर्चा का विषय बने मैंने अपना ध्यान एक कथन पर केंद्रित किया जिसमे भगवान् श्री कृष्णा कहते है ' इस दुनिया में जो भी होता है वो मेरी ही मर्ज़ी से होता है' मतलब मेरे साथ भी जो हो रहा है उसमे श्री कृष्णा की मर्ज़ी हुई अब पता नही भगवान् जो करता है वो क्या समझ के करता है। ये कथन मुझे सांत्वना देने के लिए काफी ही था की श्री राम भगवान् से देखा न गया उन्होंने रामायण में कह डाला 'हर एक कार्य के निष्पादन(सक्रियता) या निष्क्रियता के लिए मनुष्य  द्वारा ईश्वर को दोषी ठहराना समस्त मनुष्य जाती के लिए धिक्कार(लानत) के समान है'  समस्त मनुष्य जाती पर लानत बनने  से अच्छा है की अपने साथ जो कुछ भी होता आ रहा है उसकी ज़िम्मेदारी मैं खुद ही ले लू  तो बेहतर होगा । बस एक ये ही कामना है की ऐसी फीलिंग के साथ किसी को 4-5 दिन न गुज़ारने पड़े । अब फिलहाल मैं आश्वस्त हूँ।

Friday, 20 November 2015

हाँ! मैं हूँ स्वार्थी


क्या यार स्वार्थी शब्द के अर्थ का अनर्थ कर रखा है दुनिया ने.....इतने विद्वान् आए पर कोई इस अनर्थ का अर्थ नही बना पाया..... लोग कहते है स्वार्थी होना बुरी बात है.......मुझे भी बचपन से यही कहा गया है , पर मैं हूँ स्वार्थी और रहूंगी - अच्छा रहेगा अगर आप भी मुझसे स्वार्थी बन कर बात करे और मुझे भी वही समझे......अरे मुझे तो स्वार्थी लोग ही पसंद है,क्योंकि स्वार्थी शब्द का मतलब है जो सिर्फ खुद से मतलब रखता हो,जिसे सिर्फ अपनी पड़ी हो.....तो इसमें बुराई क्या है। अब मेरा ही उदाहरण ले लीजिये , मैं एक पत्रकार बनना चाहती हूँ , मैं इस समाज से बुराई को ख़त्म करना चाहती हूँ ,क्योंकि मैं खुद इसी समाज में रहती हूँ, तो इसको कैसे गन्दा रहने दूँ, अब हुई न मैं स्वार्थी.....
जब कोई अपने माँ-बाप की सेवा करता है, तो वो उनसे आशीर्वाद पाना चाहता है, अब वो इंसान भी तो स्वार्थी ही हुआ। असल में हमे स्वार्थियों की ही ज़रूरत है, जो इस समाज को दुनिया को अपना समझे और पुरे स्वार्थ के साथ खुद को इसका हिस्सा समझ कर सुधार करे। मसलन जब कोई व्यक्ति किसी और से प्यार करता है ,उस वक़्त वो भी स्वार्थी ही होता है। आप अपने प्यार के साथ समय बिताना चाहते है क्योंकि जब वो व्यक्ति आपकी नज़रो के सामने होता है तो आप खुश होते है। आप उनको परेशान नही करते क्योंकि उनको परेशान देख आप भी असहज हो जाते है ,तो हुए न आप भी स्वार्थी....
क्या बुराई है इस शब्द में 
'ये दुनिया मेरी, ये समाज मेरा
ये सरकार मेरी, तो ये सरोकार भी मेरा'
जिस दिन हर एक व्यक्ति ऐसा 'स्वार्थी' बन जाए। उस दिन ये दुनिया कई लांछनों से बच जाएगी।
इस बात में कोई दो राय नही है की कुछ बुरे स्वार्थी होते है,तो कुछ भले... जैसे सिक्के के दो पहलु होते है वैसे हर चीज़ की दो किस्मे होती है। ये बताने की बिलकुल ज़रूरत नही है की किस किस्म के स्वार्थियों की ज़रूरत है इस दुनिया को। जैसे दुनिया के लोग निस्वार्थ भाव की बात करते है...वो तो बिलकुल जायज़ नही है,क्योंकि अगर एक इंसान अपने कार्य से प्यार नही करेगा  तात्पर्य उसे लेकर स्वार्थी नही होगा,तब तक पुरे मन से काम नही करेगा। तनमयता तभी आएगी जब स्वार्थ होगा,तो स्वार्थी बनिये इस दुनिया के लिए और गर्व से कहिये  'हाँ मैं हूँ स्वार्थी'।
जय हिन्द।