Tuesday, 19 July 2016

मेरे चाय की चरस जिन्होंने बोई!



Let’s start with the date 17/7/16 क्योंकि पुरानी बातें मैं करती नहीं।  जो होगया सो होगया, रात से तैयारी कर रही थी, एक विशेष काम की, रात 2 बजे पता लगा कि पासपोर्ट की ज़रूरत है, उसके बिना रजिस्ट्रेशन भी नहीं होगा, जूनून इतना था कि रात में ही पासपोर्ट तक अप्लाई कर दिया पर मेल नहीं आया।  सुबह 7  बजे का अलार्म भी लगाया, सोचा अगर सुबह तक मेल आ गई तो भी काम चल जाएगा,  मतलब बात की गहराई को समझ रहे है न आप, बिलकुल पक्के क्रिकेट फैन की तरह अब ज़िंदगी में पेश आना शुरू कर दिया है, जैसे आखिरी बॉल पर 8 रन चाहिए हो तब भी लगता है कि नो बॉल होकर छक्का पड़ेगा फिर 2 रन लेकर इंडिया जीत जाएगी।  खैर, वो जो भी हो अब ज़िन्दगी है तो उम्मीद तो होगी ही।  जैसे-तैसे 7 बजे अलार्म से पहले आँख खुली देखा मेल नहीं आया ( अब ये ज़िन्दगी है क्रिकेट थोड़ी न है और न ही मैं एमएस धोनी  हूँ), बिना कुछ सोचे मैं दुबारा सो गई उठी 1 : 30 , "अब तो दिन मज़े से पार होगा बस हमदोनो और कोई नहीं( मतलब मैं और निधि)" लेकिन किस्मत पर बट्टा अभी खत्म नहीं हुआ था कि निधि के ऑफिस से  फ़ोन आया और उसे संडे को भी बुला लिया गया।  मुझे लगा आज जो न हो वो कम है।  वो चली गई और मैं अपनी पसंद की ड्रेस पहन के घर से निकल आई, यह सोच कर की आज कुछ तो करेंगे, इस दिन को यूँ ही घर पर बिता कर बेकार नहीं करेंगे।  मेट्रो पहुंच कर सोचा दाए या बाए, तो रोज़ वाला राइट ले लिया, फिर इंटरचेंज तक कुछ सोच नहीं पाए कि क्या करे ? तो फिर से रोज़ वाली लाइन चेंज कर ली, मतलब बात की गहराई को समझ रहे है आप वही क्रिकेट फैन वाली हिम्मत नहीं हारते चाहे कुछ हो जाए।
देखते ही देखते स्टेशन दर स्टेशन आ रहे है, माफ़ी इस अपमानजनक शब्द के लिए पर साला  आज मेट्रो कुछ ज़्यादा ही जल्दी चल रही थी, तो दुबारा माफ़ी पर साला जल्दी-जल्दी सोचना भी तो पड़ रहा था, एक बात दिमाग में आई , क्यों न आज वहा चलते है जहां से सफर की शुरुआत की थी, मतलब वो जगह जिसने मेरी यहाँ घूमने-फिरने की लत लगवाई थी।  न, न, जीआईपी नहीं  'टीएस्टा' खुले शब्दों में कहे तो टी प्रोफेशनल्स।  पहले इनका परिचय करवा दूँ।  ये 1996 से यहाँ के लोगो की सेवा कर रहे है, इनका नाम है कैपटन वी. के मेहरा, ये आर्मी से 1968 में सेवा मुक्त हो गए थे, जिसके बाद असम और वेस्ट बंगाल की सर्वोपरी चाय बाग़ान  में इन्होने काम किया, चाय की सभी तरह से जानकारी हो जाने पर इन्होने नॉएडा सेक्टर 37 में अपनी निजी चाय की दूकान खोली जिसमे इनकी अर्धांग्नी ने भी इनका साथ दिया,  इनके यहाँ चाय के सभी स्वाद प्रत्यक्ष असम  वह वेस्ट बंगाल से आए है, इसलिए यहाँ के लोगो को इनके जैसा स्वाद कही नहीं मिलता, जिसमे से मेरी पसंदीदा मसाला चाय और कश्मीरी कहवा साथ में चिकन सलामी सैंडविच और चिकन मोमोस तो और भी कही नहीं मिल सकते।  इनके यहाँ हर चीज़ ऐसे लगती है जैसे दिल से बनाते हो।
अमीर और बिगड़े हुए लोगो की यहाँ कतार रहती है, जैसे जब ये लोग घर पर होते है तो बड़ी चाय पी ही लेते होंगे। अब नखरे है भाई! जिसको दिखाने वाले भी महान है, और उठाने वाले भी महान है।  बीएमडब्लू और हार्ले तो यहाँ आम गाडी है तो रॉयल एनफील्ड बिखरी पड़ी है।
मेरे ख्याल से इतनी तारीफ  काफी होगी, बाकि आप खुद समझदार है।  कहने वाले तो ये भी कहते है कि यहाँ ड्रग्स, अल्कोहल और सिगरेट बहुत ही आसानी से मिलती है, पर एक बात बता दूँ जो लोग ये बात कहते है ना, वो यहाँ आते नहीं है। 

मेरे इस सफर की यही तो खास बात है कि ज़िन्दगी हो या खेल, मैं एक फैन की तरह ही पेश आती हूँ।  कभी धैर्य नहीं खोती, जैसे आज नहीं खोया।  देखा जाए तो ये बहुत बुरा था जो बीता, वो भी लगातार दूसरी बार चुने जाने के बाद सपना टुटा, पर ये टी-  प्रोफेशनल्स हमेशा अपनी चाय से मेरा मन भर देते है, फिर चाहे मैं दुखी हूँ या खुश।
आज बहुत दिनो के बाद यहाँ आई, अकेले एक बार फिर से, उस टूटे हुए सपने का जश्न मनाने बिलकुल वैसे ही जैसे मोहम्मद रफ़ी कहते है. . . . . . . .

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया 
हर फ़िक़्र को धुंए में उडाता चला गया 

बर्बादियों का सोग मनाना फ़िज़ूल था 
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया 

जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया 
जो खो गया उसीको भूलता चला गया 

गम और ख़ुशी में फर्क न महसूस हो जहां 
मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया

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