Wednesday, 17 February 2016

तुम ऐसी ही कोशिश करना

ऊची -ऊची इमारते चलती  फिरती ज़िन्दगी, इससे मुझे कोई मुसीबत नही है आखिर यही विकास होता है, इससे नफरत करके एक जगह ठहर जाने की बेवकूफी मुझे नही करनी और ऐसी कोई बकवास भी नही करनी जिसपे कोई कार्यवाही करने के लिए तैयार न हो, ऐसे ख्याल भी अब बोर करने लगे है।

                                                    दिल्ली  मेट्रो  के  लाइन  में खड़े  होना ,फिर जल्दी-जल्दी भाग के मेट्रो पकडना, वहां अपने आपको एक मज़बूत, लडने को तैयार और हर वक़्त जूझारू बने रहने के जज्बातों से लबरेज़ महसूस कर अच्छा लगता है, आखिर लाख गालीयाँ सुना लो इस दिल्ली शहर को पर इतना भरोसा खुद पे जमने के पीछे का कारण यहां के भागते दौड़ते हालात ही है।  ये बदलाव लखनऊ कभी न ला पाता, ना  ही हमे इस काबिल बना पाता की माँ बाप से इतर कही और गुज़र-बसर करने की  सोचते, ये कड़वी गोली दिल्ली के हाथों ही खानी थी, सो खाई पर अब तो इस गोली का स्वाद  कड़वे से खट्टा लगने लगा है थोड़ा सा आचार मिला के जो खाने लगे है हम, इन मुद्दो पर बात-चीत का सिलसिला तो फिर कभी चलाएंगे ,अभी बात कहने को कुछ और भी ज़रूरी है और वो है बदलाव सुना है पिछले 5 सालो में दिल्ली बहुत बदल गई है इनका हाव भाव , बनावट वगैरह-वगैरह..........पर अब वो महक यहां की  गलियो से नही आती । लेकिन कई मामलो में दिल्ली आज भी उसी जगह खड़ा है जहाँ उसे होना चाहिए था जैसे देश की राजनीति,  खेल,हलचल  और शहरों के मुकाबले इसने अपने आपको बहुत सहेज है ,संभाला है।
                                          लखनऊ तुम भी ये अदा दिल्ली से सीखना।  अब मेट्रो, अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम बन जाने के बाद एक अलग आंधी भाग दौड़ तुम्हे देखने को मिलेगी ,जहाँ लोग ठहरेंगे ही नही।  एक दूसरे को सलाम करने की ज़ेहमत तो छोड़ो रुक के मुस्कुराने तक का समय भी नही होगा पर तुम हिम्मत मत हारना, तुम्हारे जो पुराने मोहोल्ले है उनकी तरफ देखना , उन्होंने  ही दिल्ली को बचाया है और वही तुमको बचा लेंगे फिर भी अगर काम न बने, सब कुछ अपने हाथ से निकलता हुए दिखे तो मैं हूँ ना मैं या मेरे जैसे और लोग जो लखनऊ से दूर कहीं और रह रहे है वो आ कर इस सभ्यता को बचा लेंगे क्योंकि हमारे जैसे लोग ही  तुम्हारे इत्र से महरूम है और उसको कितना याद करते है ये हम या हमारे जैसे लोग ही बता सकते है तुम्हारी बोली आवाज़ सुनने  को तरस गए है ,इस वक़्त हम उन्ही देश भक्तो के जैसे महसूस कर रहे है जो स्वदेश से दूर अपने देश को दिल में बसाए अपनी ज़िन्दगी जी रहे है और मौका पड़ते ही कई सारे किस्से फुटकर में दुसरो को सुना रहे है।  

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