Monday, 20 July 2015

फुटबॉल के देसी जादूगर.....

आजादी एक ऐसा शब्द है जिसको पाने के लिए हमारे लोगो ने कितना खून बहाया । बात करीब 1940-1950 के बीच की है जब हमे आज़ादी मिलने के आसार बने और 1947 में आज़ादी मिल भी गई। हम आज भी कुछ गिने चुने नेताओ को जानते है जो हमारे दिलो में एक अलग ही इज़्ज़त रखते है। शायद सिर्फ इतना ही जानते है हम आज़ादी के बारे में क्योंकि हमारी किताबो ने इतना ही बताया है पर आज आप एक नया किस्सा सुनेगे जो आज़ाद भारत का है पर किसी किताब में शामिल नही है और इसका रिश्ता आज़ादी से भी नही है।
बात है 1948 समर ओलंपिक्स की जब वर्ल्ड वॉर  दो के सदमे को झेल चुकी दुनिया ने एक बार फिर 12 साल बाद ओलंपिक्स करवा कर खेल को दोस्ती का रास्ता बनाया । उस वक़्त नए -नए जन्मे हिन्दुस्तान ने भी अपनी साख एक आज़ाद देश  के तौर पर बनाने की सोची। AIFF (All India Football Federation) का निर्माण कर फीफा से सदस्यता लेने का आग्रह किया। फीफा ने हमे 79th सदस्य घोषित कर समर ओलंपिक्स के लिए हरी झंडी दिखा दी। फेडरेशन बन गई थी पर ज़रूरत थी टीम की । हॉकी और बाकि खेलो में तो हम तबसे मश्हूर थे, जब आज़ाद भी नही थे । तबसे ध्यान चन्द जैसे खिलाडी भी साथ थे, पर फुटबॉल का ध्यानचंद ढूंढ पाना आसान नही था। यूरोप की तरह 19 वीं शताब्दी में फुटबॉल का परिचय हिंदुस्तान से हो चूका था  इसलिए इस खेल के लिए खिलाडी ढूंढना  कोई मुश्किल काम न था । आखिर अंग्रेज़ एक ये भी अच्छा काम कर गए , हमे क्रिकेट तो सीखा ही दिया  साथ-साथ फुटबॉल का भी चस्का चढ़ा गए।
AIFF ने पूरी टीम को इकठा किया और लंदन रवाना कर दिया। वहा पहुच कर हमने 5 वार्मअप मैच लोकल टीम से  खेले ।
Department Store Xl , Metropolitan Police FC , Hayes FC , Alexander Park FC , Pinnes FC  कुल मिलाकर भारतीय टीम ने 39 गोल किये और सिर्फ 5 ही गोल हमारे खिलाफ हुए। हमारा  खुद पर भरोसा भी सातवे आसमान पर पहुच गया । उस वक़्त हम अपनी फ़िज़ा बना रहे थे । वहा के अखबारो में हिन्दुस्तानी टीम का नाम छपा पड़ा था। सबको लग रहा था की पहली बार अन्तराष्ट्री मैच खेल रही टीम इंडिया इतनी हलकी भी नही है , पर सबसे बड़ी खबर ये नही थी। सबसे बड़ी खबर उस दिन बनी जब पहला मैच इंडिया का फ्रांस के साथ पड़ा। फीफा के नियमो के मुताबिक हर टीम को जूते पहन के खेलना होगा। हमारे पास पैसो की कमी नही थी , पर हमारी टीम ने बिना जूतो के फुटबॉल हमेशा से खेला था । ऐसे में अचानक जूते पेहेन के अंतराष्ट्रीय मैच खेलना हमारी टीम के लिए अजीब था क्योंकि जिसने कभी फुटबॉल जूते पहन के न खेला हो वो अपने ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मैच जूतो के साथ कैसे खेल सकते है, ये काफी मुश्किल था पर फीफा के नियमो के चलते 3 खिलाडीयो ने जूते पहन कर खेलने का आग्रह स्वीकार लिया और बचे हुए 8 खिलाडीयो ने पैरो पर गरम पट्टी  बांध कर नियमो का सम्मान किया। उस समय भारतीय खिलाडी लंदन के मोहोल के आदी भी नही थे। लंदन में गुलाबी ठण्ड में नंगे पैर गीली घास पे फुटबॉल खेलना बहुत मुश्किल था। किसी तरह विवाद ख़त्म  हो मैच शुरू हुआ । ये मैच ईफोर्ड पूर्वी लंदन के एक कसबे में हुआ। हमारी टीम फार्मेशन कुछ इस तरह थी।
Goalkeeper-Varadaraj K.V
Defence- Shailendra Manna & Taj MD
Mid-fielders- Basheer , A.S Talimraan (captain) , Mahabir Prasad
Forward- Rabi Das , B.Pareb Maha Chandra , Sahu Mewalal , Ahmad Khan , Sarangapani Raman
2:3:5 यही फार्मेशन फ्रांस का भी था। दर्शक दीर्घा में खेल का उत्साह ही अलग था। कुछ का मानना था की हिन्दुस्तानी  नौसिखिये है तो कुछ हमारा पूर्व प्रदर्शन लोकल टीमो के खिलाफ देख कर दंग थे क्योंकि ये मैच शूज़ v/s नॉन-शूज़ का भी था। पहले 30 मिनट के हाफ में फ्रांस ने एक गोल कर दिया था।दूसरे हाफ में इंडिया के तरफ से आक्रमण कर सारंग और मन्ना ने साझेधारि में एक गोल कर बराबरी हासिल कर ली क्योंकि जब खोने को कुछ न हो तो इंसान बहुत खतरनाक हो जाता है। इसके बाद तो इंडिया ने वो खेल दिखाया जिसको देख दर्शक भी अपनी टीम को भूल गए । इंडिया को दो पेनाल्टी मिली हमारे सबसे अच्छे खिलाड़ी ने पहला शूट लिया  पर वो चूक गए  क्योंकि जूतो में शूट लेने की आदत नही थी दूसरा शूट लेने से उन्होंने मना कर दिया इत्तफाकन दूसरा शूट भी गोल में तब्दील न हुआ। विश्व फुटबॉल इतिहास में इस  घटना को 'regretful' नाम से जाना गया। अंत में मैच को बराबरी पर जाता देख एक्सट्रा समय दिया गया पर हमारे खिलाडी तो सिर्फ 60 मिनट ही खेलने के आदि थे और मैच चला 90 मिनट । ऐसे में फ्रांस हम पर हावी होगया और आखिरी के 120 सेकंड में 1 और गोल कर दिया। बेशक मैच फ्रांस ने जीत पर दिल हिन्दुस्तान ने । हमारा ये खेल देख कर इंग्लैंड के प्रिंस जॉर्ज V। ने पूरी टीम को बंकिंगहम पैलेस  भी बुलाया । ओलंपिक्स के बाद इंडिया जब यूरोप टूर पे आई तब एम्स्टर्डम को 5-1 से हराया और इंग्लैंड से 3 मैच जीते 2 ड्रा कराए ।
ये सफ़र समय के साथ तो ख़त्म हो गया पर इसकी यादे  आज भी बंकिंगहम पैलेस में ज़िंदा है । बिलकुल देसी तरिके से फुटबॉल खेलते हुए फ्रांस से हारने के बावजूद सारी सुर्खिया बटोर ले गए  वो लोग हिन्दुस्तानी खिलाडी ही हो सकते है। शायद हम इन्हें न जानते हो इनका नाम भी न सुना हो पर इनका दिल और दिमाग एक ही बात जनता था और वो था इंडिया । हिन्दुस्तान के लिए जान देने के इलावा हिन्दुस्तान के लिए खेलना भी महान काम है  इसलिए इनको भी उतनी ही इज़्ज़त मिलती थी जितनी की आज़ाद हिन्दुस्तान के सैनिक को मिलती थी। ये हार कर भी बाज़ीगर साबित हुए।

Thursday, 16 July 2015

एक दिन परवाह तो करने दो......

आखिर एक दिन......
एक दिन तो उसे परवाह करने दो
न जाओ कही ,न आओ, कही न करो कोई बात
आखिर एक दिन....
एक दिन तो परवाह करने दो.....

न जवाब दो, न सवाल पूछो, न करो किसी बात का इज़हार
आखिर एक दिन....
एक दिन तो परवाह करने दो.....

लेकिन मैं क्या करू उसे तो तड़पता छोड़ दू की शायद वो मेरी परवाह करे पर खुद का क्या करू

ए दिल......सुन ले!!!!!!!
उसके लिए धड़कना बंद कर.....
जब वो प्यार ही नही करता है!
तू तो जानता है वो खुदगर्ज़ है!
वो लापरवाह है!
उसे तेरी नही खुद की फ़िक्र है!
क्या ये सच जानकार भी तू अपनी इन हरकतों से बाज़ नही आएगा।
!
मुस्कुरा मत......तेरा जवाब मिल गया.....
तो ठीक है मेरी मान और एक दिन बस एक दिन उससे बात मत कर.....अगर जादू होगा तेरी आशिक़ी में.......तेरी तिश्नगी में.....तो एक दिन वो भी तेरी परवाह करेगा.....ये समय जो वो अकेला कटेगा बताएगा की उसे कितनी परवाह है। ये उसके एहसास के लिए कर। उसकी तेरे लिए जवाब देही के लिए कर। बस एक दिन.....
वो ज़रूर आएगा!!!!!?

बात कुछ इतनी सी है की......

जब तुम्हे ऐसा लगे
मेरे बिना अधूरा सा लगे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे

जब तुम्हारे लब खामोश रहने लगे
मेरे बिना समय तुमसे कटता सा लगे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे

जब तुम्हारी आँखे एक टक कुछ देखती रहे
मेरे आगे पीछे तुम्हारा ध्यान लगा सा रहे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे

जब तुम्हे मेरी आदत सी होने लगे
पर मेरा दिल तुमसे डरता सा लगे
तब समझ जाना की तुम कुछ सही नही कर रहे......

Thursday, 2 July 2015

डिजिटल व्याकरण

भारत के डिजिटल होने की शुभकामनाए आप सबको, अब हम सब एक ऐसे देश के वासी हो गए है, जहा सिर्फ गंगा ही नही बहती, बल्कि एक क्लिक पे सारी जानकारी भी मिलती है। एक तो हम सब पहले से ही दुनिया में सबसे ज़्यादा इंटरनेट और स्मार्टफोन इस्तेमाल करते है, ऊपर से अब सारी सरकारी सुविधाए  भी डिजिटाइज्ड हो गई है। इसका श्रेह तो मोदी जी को जाता है पर पूरी तरह से नही, इसमें कोंग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री राजीव गांधी जी भी शामिल है। जो कंप्यूटर और इंटरनेट को हमारे घर तक लाए। उस वक़्त कहा गया था की कंप्यूटर किसानो के बड़े  काम आएगा ,तब सवाल उठा की क्या कंप्यूटर हल भी चलाएगा? तब प्रधानमंत्री जी ने जवाब दिया की वो केवल मौसम की जानकारी देगा, कितनी खाद पड़नी है, कब पड़नी है, कौनसी फसल उगनी है ये सब बताएगा। कहना सत्य था पर कंप्यूटर यहाँ आ कर किसानो के काम न आया कारण अनपढ़ ज़्यादा है इस देश में। किसानो ने कभी ध्यान ही नही दिया , इन सरकारी सुविधाओ का लाभ कभी उन तक नही पहुचा। तब ज़माना और था अब ज़माना और है। इस डिजिटल सप्ताह की शुरुआत पे मोदीजी ने कुछ महत्वपूर्ण घोषणाए की है उनपे एक नज़र डालते है आगे की कहानी बयां करने से पहले।
-डिजिटल लॉकर सिस्टम( जहा आप अपने महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट्स को डिजिटली बदल कर रख सकते है।)
- my.Gov.in (जहा आप सरकारी मसलो पे अपनी राय रख सकते है)
- स्वछ भारत मिशन मोबाइल एप्प
- इ- सिग्नेचर (ITR या व्यापारियो के लिए , आधार से सम्मलित )
- इ- अस्पताल (अपॉइंटमेंट, खून की आवश्यकता पर उपलब्ध होने वह न होने की जानकारी, फीस इत्यादि)
- राष्ट्रिय छात्रवृति पोर्टल
- सभी रिकार्ड्स डिजिटाइज्ड होंगे
- भारत नेट प्रोग्राम
- बीएसएनएल व्हाई-फ़ाई कुछ चिन्हित स्थानो पर
इत्यादि

ये वाकई सराहनीय कदम है पर क्या भारत इसके लिए तैयार है? क्या सच में जो उम्मीद इससे लगाई जा रही है ये उतना कारगर है? या सिर्फ दिखावे की रेस का नंबर 1 घोडा है !
कुछ विशेषज्ञो को ऐसा कहते सुना गया है की अगर सरकार पहले से शुरू कर दी गई योजनाओ को सहेजे  तो भारत किसी भी माइनो में पिछड़ा न रहे, हमे नए योजनाओ की ज़रूरत अभी नही है, बल्कि जो पारित हो चुकी है उनसे अपना आज बेहतर बनाना है। ये नसीहत अच्छी है पर अपने प्रधान सेवक अगर कुछ नया नही करेंगे  तो उन्हें राजीव गांधी जी की तरह याद कैसे रखा जाएगा।
कुछ सवाल अपने प्रधानमंत्री से जो शायद हर भारतीय नागरिक को पूछना चाहिए।
डिजिटल इंडिया का मतलब है की अब डेटा इ-मेल से ट्रान्सफर होगा , तो क्या हमारे ऑफिशल्स इतने 'डिजिटल लिट्रेटे' है की वो .nic.in का इस्तेमाल करेंगे, अपनी जी-मेल आईडी का नही, क्योंकि जी-मेल तो विदेशी कंपनी है। ( कभी.nic.in क्रेश कर गई जो अक्सर कर जाती है ,तब जी-मेल इस्तेमाल किया गया तो हमारा सारा डेटा चाहे डिफेन्स का हो या इकॉनमी का सब विदेशो में काले धन की तरह जमा हो जाएगा)। मान लीजिये की हम इतने लिट्रेटे निकले की .nic.in का  इस्तेमाल  किया, तब हमारी अकलमंदी पर हैकरो की नज़र लग गई तो?  हम तो खोखले हो जाएंगे!
एक घोषणा और की है की ग्राम पंचायतो को भी सर्वर से जोड़ दिया जाएगा , पर आजतक सिर्फ दिल्ली के 50 लाख लोगो को तो जोड़ नही पाए , वो भी साईट क्रैश से परेशान है।
आधार की ज़रूरत को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कीआधार NRI भी बनवा रहे है,वेरिफिकेशन का कोई स्पष्ट तरीका सरकार द्वारा चिन्हित नही किया गया है, रेटिना स्कैन और फिंगरप्रिंट डेटा को पूरी सुरक्षा भी नही दी गई है, इसलिए आधार को बनवाना हर आदमी की मज़बूरी नही है अगर ज़रूरत हो तो बनवाए चाहे ना बनवाए , और आपने आधार को डिजिटल लॉकर और इ-सिग्नेचर से जोड़ दिया।
आप सभी की जानकारी के लिए बता दू की इस डिजिटल इंडिया का कोई 'लीगल होमवर्क' नही किया गया है। डिजिटल सिग्नेचर पहले से पारित है पर 2 साल से कोई नोटिफिकेशन जारी नही की गई है। इसमें कोई सख्ती भी नही है, कॉमर्स इंडस्ट्री पूरी ढील से काम कर रही है । इसमें कोई दोराय नही है की डिजिटल इंडिया से पारदर्शिता बढ़ेगी, नौकरशाही जैसे तमाम कर्को से हम उभरेंगे लेकिन कही ये जल्दबाज़ी में और बड़ा खतरनाक कदम तो साबित नही होगा?  ऐसा न हो की अभी तक हमारे बेहद असंवेदनशील रिकॉर्ड  स्थाई रूप से संकट में थे ,पर अब डिजिटल होते ही इनका इस्तेमाल कोई और न कर ले मसलन ' साइबर क्राइम' जो अभी तक हमारी क़ानूनी समझ में झूल रहा है। इन सभी योजनाओ में बहुत सारी काम की है तो बहुत सारी नाम की ।
फेसबुक, गूगल जैसे साइट्स हिंदुस्तान की रग-रग में बस चुकी है। इनके पास हमारा सारा डेटा है।ये हमे मुफ़्त में अपनी सर्विस दे रही है क्योंकि हम इनके प्रोडक्ट है । ये हमारे बारे में सभी बारीकियो से अवगत है। अब हमे ऐसा कोई कानून लाना चाहिए जो हमारे डेटा ट्रान्सफर करने पर पेनलिटी के नाम पे इनसे वसूला जाए । जैसे यूरोप में हुआ , डेटा ट्रान्सफर का दोषी पाए जाने पर यूरोप गवर्मेंट ने गूगल के टर्नओवर ओवर पर 10% की पेनलिटी लगा दी थी, और  गूगल को भरना पड़ा । यूरोप देश से कोई भी डेटा बाहर ले जाएगा तो उसे जेल हो जाएगी। ऐसे कानूनों की ज़रूरत भी हो गई है क्योंकि डिजिटल इंडिया अब एक उपलब्धि ही नही ज़िम्मेदारी भी बन गया है।
मैकिंसे और फेसबुक की ग्लोबल स्टडी के मुताबिक भारतीय जनसंख्या में 1 बिलियन लोग इंटरनेट इस्तेमाल नही कर रहे है क्योंकि वो देहात में रहते है, अनपढ़ है और उनके आस-पास का माहौल  भी प्रोत्साहित नही करता। ऐसे 37% भारतीय वयस्क है जो अनपढ़ है मतलब 287 मिलियन । अब कही "डिजिटल इंडिया" , "डिजिटल डिवाइड" में न बदल जाए।
जिस तरह एक उम्मीद की किरण हर जगह होती है , वैसे ही यहाँ भी एक खबर आई है महाराष्ट्र के एक गाव में किसान कॉल सेंटर से परेशान होकर किसानो ने एक ' बाली राजा' नाम से व्हाट्सअप ग्रुप बनाया है और उसमे कई खेती विशेषज्ञो को जोड़ा है। अब वहा के किसान अपनी समस्या का समाधान व्हाट्सअप से करते है, क्योंकि ये हिन्दुस्तान है । दुनिया को अचम्भे में डालना हमारा काम है । उम्मीद करते है की हम मतलब हिन्दुस्तान ये फिर से कर के  दिखाएंगे। जय हिन्द।