Tuesday, 24 February 2015

कितना बुरा था मेरा अच्छा होना

"हर बुराई का इलज़ाम हम पर आ गया
कितना बुरा था मेरा अच्छा होना
ये सोच की अदालतों ने जता दिया"

कभी -कभी ज़िन्दगी में ऐसे  मौके आते है जब आप अच्छे होते हुए भी बेहद बुरे हो जाते है ,शायाद गलती अच्छे बनने की कोशिश से ही शुरू होती है और ये गुन्नाह तब बनती है जब आप पूरी तरह अच्छे बन चुके होते है।
यु तो माँ-बाप अपने बच्चों को बचपन से ये सीख देते रहते है की 'बेटा ज़िन्दगी में कभी भी कुछ भी हो जाए हमसे कुछ छुपाना मत सब बता देना सच-सच हम तुम्हारे माँ-बाप है सब संभाल लेंगे ' ये बात अपने माँ-बाप से सब ही ने सुनी होगी ......मैंने भी सुनी है ।
पर इसपे जब बच्चे अमल करते है तो ये बुराई या गुस्से का पात्र क्यों बन जाती है ? अगर मैं अपने पिता को बताती हु की मुझसे कोई गलती हुई है तो इसे समझना क्यों इतना बुरा है उनके लिए और अगर बुरा है तो बचपन में उन्होंने ऐसा क्यों कहा था की ' सब बताना मैं हु ना'
वैसे तो इतनी हिम्मत किसी में नही की जिस किसी से प्यार किया हो
उसे अपने घर वालो के सामने बताना की 'मैं इससे प्यार करती हु पर अभी हम एक दूसरे को सिर्फ अपने परिवारो से मिलवाना चाहते है अपने करियर को बनाने के बाद ही कोई फैसला लेंगे पर ये रिश्ता आप सब के सामने लाना चाहते है बिना कुछ छुपाए "   मान लेते है की ऐसे कहने की हिम्मत कोई लड़की कर भी ले  तो क्या होगा???.....
          सीन पलट जाएगा.....!!!!! समझदारी से किया हुआ काम दुस्साहस में बदल जाएगा ......,माँ का ब्लड प्रेशर लो या हाई हो जाएगा......., भाई का दिमाग जल उठेगा .........., और ये सब देख के लड़की की जो हालत हो गई होगी वो बाप को नौटंकी लगने लगेगी ,दोनों को अपने घर में ज़िल्लत भरी निगाहो से देखा जाएगा जैसे उन्होंने ये गुनाह आखिर कर कैसे दिया इतना घटिया काम तो कभी किसी ने नही किया इन लोगो को तो मार देना चाहिए पर क्या करे अपने ही बच्चे है । ये तो हम है जो माफ़ कर दिया कोई और होता तो कब का गला काट के फेक दिया होता ( और मैं आपको याद दिल दू ये वही माँ-बाप है जिन्होंने बचपन में अपने बच्चों को गोद में लेकर कहा था की कभी भी कुछ मत छुपाना हम है ना सब संभाल लेंगे)
              ये कहानी अभी यहाँ खत्म नही हुई है बस शुरू हुई है जिसकी शुरुआत उसकी पढाई में रोड़े से होती है बड़ी मुश्किल से एडमिशन करवाते है फिर हर वक़्त जासूसी उसको ज़लील करते है  उसपे शक करते है कभी-कभी अगर वो कही जाने की बात कह दे तो मना कर देते है मुह खोल के जैसे गुनाह उसने किया हो और वो कुछ झेली ना हो उसका दिल तो सख्त है कभी दर्द थोड़ी ना होता है अब तक भूल भी गई होगी तो चलो उसे याद दिला  दे की उसने गुनाह कर रखा है उसे हर वक़्त सजा देते रहे अगर वो मानसिक तौर पे इससे निकलना चाहे तो उसे घसीट के वापस ले आए भूलने मत दे की उसने गुनाह किया है।
                   अब तो मैं भी मानती हु की उसने उसने गुनाह किया है अपने घर पर बता कर ............ उसने गुनाह किया है बचपन की सीख को मान कर ........ उसने गुनाह किया है अच्छा बन कर .......!!!!!!!
             माँ-बाप को अपबे बच्चों के इस कदम की सराहना करनी चाहिए ना की सीन पलट देना चाहिए ....... उस पर विश्वास करना चाहिए न की उससे मेहनत करवानी चाहिए विश्वास को इक्कठा करने में ........ बच्चे है वो आपके सच बता रहे है इसका आकलन करे अभी और बेहतर भविष्य के लिए...............

Wednesday, 18 February 2015

चप्पलिया दोस्ती

जी जनाब....
बड़े सवाल आए  होंगे मन में इस शीर्षक को पढ़ने के बाद ......,होना भी चाहिए जी .... ज़रूरी है । 'चप्पलिया' मतलब चप्पल । बात बहुत सीधे तौर पे एक किस्से से जुडी है । जो अभी कुछ घंटो पहले ही घटित हुआ था। इस किस्से ने हमे कुछ देर की मौज दी पर मुझे बहुत कुछ सीख दिया । तो हुआ यु की लखनऊ विश्वविद्यालए के मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के सामने हम अपने दोस्तों के साथ चक्कलस काटने में मसरूफ़ थे । इतने में याद आया की अपनी ज़िन्दगी का खुद से भी ज़्यादा ज़रूरी हिस्सा मेरा एंड्राइड फोन क्लास में ही छूट गया । बस फिर क्या था आनन-फानन में भागना  शुरू किया जैसे की ट्रेन छूट रही थी ............. भागते-भागते क्लास तक पहुचे ही थे मतलब ट्रेन पकड़ी ही थी की चप्पल ने साथ छोड़ दिया ....... अब लगा ये ज़्यादा बड़ी मुसीबात हो गई .....ख़ैर! अब पसांगा पला है तो झेलो और बनो पि.टी.उषा ....उतने में याद आया की स्टाफ रूम से सेफ्टी पिन ले लू । सुरभि मैम को ढूंढ सेफ्टी पिन लिया लगाया फिर निश्चिन्त हो के कैंटीन की ओर फिर चक्कलस करने को बढ़ लिए ..... अब है तो एक सेफ्टी पिन ही कितना साथ देगी .....उसने भी दम तोड़ दिया ....फिर क्या था किसी तरक घसीटते -रगड़ते दोस्तों तक पहुच गए । वह मिली विश्वास से ओत-प्रोत पूजा जिनके हिसाब से इस चप्पल को जुड़वाने के लिए मोची के पास न जा कर यही ठीक करेंगे क्योंकि इसमें किक है.......
और मिली निधि ,कोमल जिनको थोड़ी सान्तवना थी की अब 'क्या होगा' पर उस वक़्त मुझे एक चाडक्य की ज़रूरत थी जो एक सही जवाब दे सके ....
बैरहाल ! किसी तरह हम सबने सोचा की बैंक के पास से आल पिन या पेपर पिन का इंतज़ाम किया जाए और किया भी गया ..... बस यही है दोस्ती वरना किसी को क्या पड़ी थी मेरी और मेरी चप्पल की......
          पिन ढूंढ के लए पर कुछ न हुआ फिर थोडा मोची की तरह सोचा आल पिन को कील की तरह इस्तेमाल किया अब हथौड़ा कहा से लए तो लाल  ईटा दिखा उससे कोशिश की ......अब मज़ेदार बात तो ये है की हम लोगो को ऐसा पागलपन करते हुए पूरा इलाका देख रहा था | सब सोच रहे थे की ये लडकिया क्या कर रही है।
   वो कहतेहै न देने वाला छप्पर फाड़ के देता है । मैंने एक चाणक्य माँगा था भगवान् ने चाणक्यओ की टोली भेज दी ..... वहा हमारे क्लास के लड़के सुशील, आकाश, रबिंशु, ज़करिया, और आश्विन आ पहुचे पूछने पर  हम लोगो ने बताया की क्या हुआ फिर तो साहब कोशिशो की झड़ी लग गई । ये सुनने में बड़ा अच्छा है पर इस चप्पल तोड़ किस्से ने मुझे मेरी अहमियत का ज़ाइका दिया वरना अब इतने लोगो को क्या पड़ी थी मेरी या मेरी छापल की......
बड़ी देर कोशिश की जनाब पर चप्पल न होगई घर का दामाद हो गई बिलकुल नाराज़ जुड़ने को तैयार ही नही फिर क्या था हार कर आश्विन बोला की मेरी गाडी यही कड़ी है और चाभी मेरे पास है ...... चलो ! छापल से माथा -पच्ची अब मोची को ही करने दो ।.......
         अब मोहौल शांत हुआ मेरी चप्पल कांड का जवाब  मिल गया  । इलाके में शांति हुई और सब कट लिए......
    कोशिश नाकाम ज़रूर हुई पर मेरी अहमियत और इन सबका प्यार मैं आप सबसे बाटे बिनक न रह पाइ । यु तो ज़िन्दगी में बहुत कुछ घटित हो जाता है पर इसका आंकलन कोई नही करता  अगर करना शुरू कर दे तो आप असल माइनो में अपडेटेड केहलाएंगे .......
        शुक्रिया दोस्तों तुम सबके साथ का और इस चापलिया दोस्तीकी खास याद का.........

Tuesday, 17 February 2015

"भरोसा" मतलब "खेल"

एक बहुत भरी सा , सबसे ज़्यादा सुनाई देने वाला पर बेहद "shortage" वाला शब्द  "भरोसा"
सुन कर लगता है जैसे इसके बिना दुनिया न चलेगी और सच भी है नही चल सकती पर आज कल का युवा जितने दंद-फंद न मचाए सो कम है | इस पीढ़ी ने तो इस शब्द का मतलब ही बदल दिया है | माना की में भी इसी पीढ़ी की हु पर थोड़ी से रूढ़िवादी हु कुछ शब्दों को लेकर जैसे "प्यार" ,'मेरे लिए प्यार का मतलब प्यार होता है ,पर आजकल प्यार का मतलब खेल होता है '| .......

अगर आप किसी अनजान से मिलते है चाहे फेसबुक पे ,या क्लास में, या ऑफिस में तो "वो" आपको जानने की कोशिश करता है फिर समझने की कोशिश करता है (पहले के ज़माने में तीसरी स्टेज प्यार होता था और अब खेल होता है) फिर वो अपना खेल शुरू करता है| आपके भोलेपन का बागपन का फायेदा उठता है | थोडा फ्रैंक ज़्यादा फ़्लर्ट करता है | आपको पूरी तरह "भरोसे" जैसे शब्द के आस- पास नचा के रख देता है | जिसको आप अपना भरोसेमंद समझ कर सब बता रहे है वो आपके भरोसे से खेल रहा है और आप बाद में कहती है .........."आई ट्रस्टेड हिम".....!!!!!!

ऐसे खेलंदरो से बचने का एक ही तरीका है | इस "भरोसे" जैसे शब्द की ऐसी परिभाषा को अपनाओ जो लेटेस्ट हो , जो आपके मम्मी -पाप के ज़माने से चली आ रही है वो नही |
                                                    ऐसे आप खुद भी बच जाएंगे और आपका महौल भी ............अपनी ज़िन्दगी के शब्द कोष को ऑक्सफ़ोर्ड की डिक्शनरी की तरह अपग्रेड करते रहो तो दुनिया में आप सेर होंगे और आपका सवा सेर कोई न होगा ......वैसे अगर आप ऐसे किसी "भरोसे" के चक्कर में आ चुके हो तो कोई बात नही इसे पूरी शालीनता से मानो कि "हा मेरे साथ खेल हुआ है और अब ऐसा न हो इसलिए मैं सतर्क रहूंगी क्योंकि इंसान तो गलतियों का पुतला है " और बाबा आमिर खान जी ने भी 3 इडियट्स में कहा था कि "मेक योर ओन मिस्टेक्स" तो गलतियां करते रहो और सीखते रहो बस कोशिश करके उन गलतियों को दोहराओ नही .........
अब बैठे क्या हो उठो और अपनी डिक्शनरी अपग्रेड करो ............

Thursday, 12 February 2015

शिकायतें

शिकायतें होने को तो किसी से भी हो सकती हैं .... किसी सरकारी कर्मचारी से या सरकार से किसी सामाजिक अभिशाप से या समाज से कभी कभी तो भगवान से बस फर्क ये है कि कोई उससे करता है तो कोई उसकी करता है ...... पर यहाँ मसला ये नही है कि दुनिया कितनी गलत है यहाँ मसला ये है कि आप कितने सही हो ........

यूँ तो हमने बहुत शिकायतें की हैं पर क्या हमने कभी दुनिया में नुक्स निकालने से पहले अपने अन्दर झाँका है क्यों ...... मुझे यकीन है कि आप सभी ने एक ना एक बार ऐसी कोशिश जरुर की होगी पर कुछ समझ में ना आया होगा अब यही बातें एक व्यक्तिगत नजरिये से समझने की कोशिश करते हैं....

“भरोसा मत करना इस दुनिया के लोगों पर, मुझे तबाह करने वाला मेरा बहुत अजीज था”
ये एक और नजरिया है किसी अन्जान शायर का इंसान को तबाह करने की ताकत इस दुनिया में किसी के पास नहीं है सिर्फ खुद उस इंसान के .... जब भी कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में जाता है तो उसे दूसरे व्यक्ति से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और उनको पूरा करने में रिश्ता अपने आप ही ख़त्म हो जाता है क्योंकि दोनों रिश्ते एक दूसरे से “थक” जाते हैं मेरी शिकायत इसी अपेक्षा से है ...... ना किसी से कोई अपेक्षा रखो ना कोई रिश्ता बर्बाद हो और ना ही किसी की ज़िन्दगी तबाह हो पर इसका एक और मतलब है कि कभी किसी को अपने इतना करीब भी मत आने दो कि ज़िन्दगी उसके अधीन हो जाए .....

अब इसी बात को समझाते हुए किसी नामचीन पर मेरे जहन में अन्जान शायर ने कहा है जो कि स्वर्ण अक्षरों से अंकित है मेरे जहाँ में कि “प्यार भी बड़ी अजीब चीज़ होती है, एक थक जाए तो दोनों हार जाते हैं..” एक शिकायत खुद से करो कि क्यों किसी के आने या जाने से मुझे फर्क पड़ता है... ये ज़िन्दगी एक यात्रा है जिसमे कई आएँगे और कई जाएँगे पर सफ़र यूँ ही चलता रहेगा और एक फैसला भी करो ....

अगर कभी किसी के होने से फर्क पड़ता है तो उसे एक किताब की तरह समझो क्योंकि किसी भी वक्त ये फैसला करना पड़ सकता है कि “पृष्ठ बदलना है या किताब बंद करनी है”
अब आइये एक और नजरिया देखते है ये एक अन्जान शायर ने कहा है कि “हमे शौक है इतना फरेब खाने का देख ही नहीं सकते असल रुख जमाने का” इनसे थोडा इत्तेफाक रखा जा सकता है क्योंकि सच में ज़माना हद से ज्यादा बदल गया है .... पहचानिए वरना शिकायतें करते रह जाएँगे और जमाना और भी आगे निकल जाएगा ... अपने हर सवाल को उठने दीजिये और उसका जवाब ढूढिये ...

शायद यही तरीका है खुद को तबाह होने से बचाने का .....
यूँ तो मुश्किल है किसी को भुलाना पर फिर भी याद रखे और इनकी बात को अपनाएं ... “सारी दुनिया के रिवाजों से बगावत की थी याद आता है हमने भी कभी मोहब्बत की, चैन से रहिये और राहत इन्दौरी साहब की बात गौर से सुनिए और सुनाइए ... ये कहते हैं कि अकेले रहने का भी अलग सुकून है ना किसी को पाने की चाह है ना किसी को खोने का डर”
अरे ! कभी तो पतंग उड़ाने का सुकून लीजिये जरुरी है कि पेंच लड़ाए जाए ... हवाओं का रुख देखिये इससे पहले तूफान आए अपनी पतंग को जमीन पे ले आइये ...

-    राजसी स्वरुप