"हर बुराई का इलज़ाम हम पर आ गया
कितना बुरा था मेरा अच्छा होना
ये सोच की अदालतों ने जता दिया"
कभी -कभी ज़िन्दगी में ऐसे मौके आते है जब आप अच्छे होते हुए भी बेहद बुरे हो जाते है ,शायाद गलती अच्छे बनने की कोशिश से ही शुरू होती है और ये गुन्नाह तब बनती है जब आप पूरी तरह अच्छे बन चुके होते है।
यु तो माँ-बाप अपने बच्चों को बचपन से ये सीख देते रहते है की 'बेटा ज़िन्दगी में कभी भी कुछ भी हो जाए हमसे कुछ छुपाना मत सब बता देना सच-सच हम तुम्हारे माँ-बाप है सब संभाल लेंगे ' ये बात अपने माँ-बाप से सब ही ने सुनी होगी ......मैंने भी सुनी है ।
पर इसपे जब बच्चे अमल करते है तो ये बुराई या गुस्से का पात्र क्यों बन जाती है ? अगर मैं अपने पिता को बताती हु की मुझसे कोई गलती हुई है तो इसे समझना क्यों इतना बुरा है उनके लिए और अगर बुरा है तो बचपन में उन्होंने ऐसा क्यों कहा था की ' सब बताना मैं हु ना'
वैसे तो इतनी हिम्मत किसी में नही की जिस किसी से प्यार किया हो
उसे अपने घर वालो के सामने बताना की 'मैं इससे प्यार करती हु पर अभी हम एक दूसरे को सिर्फ अपने परिवारो से मिलवाना चाहते है अपने करियर को बनाने के बाद ही कोई फैसला लेंगे पर ये रिश्ता आप सब के सामने लाना चाहते है बिना कुछ छुपाए " मान लेते है की ऐसे कहने की हिम्मत कोई लड़की कर भी ले तो क्या होगा???.....
सीन पलट जाएगा.....!!!!! समझदारी से किया हुआ काम दुस्साहस में बदल जाएगा ......,माँ का ब्लड प्रेशर लो या हाई हो जाएगा......., भाई का दिमाग जल उठेगा .........., और ये सब देख के लड़की की जो हालत हो गई होगी वो बाप को नौटंकी लगने लगेगी ,दोनों को अपने घर में ज़िल्लत भरी निगाहो से देखा जाएगा जैसे उन्होंने ये गुनाह आखिर कर कैसे दिया इतना घटिया काम तो कभी किसी ने नही किया इन लोगो को तो मार देना चाहिए पर क्या करे अपने ही बच्चे है । ये तो हम है जो माफ़ कर दिया कोई और होता तो कब का गला काट के फेक दिया होता ( और मैं आपको याद दिल दू ये वही माँ-बाप है जिन्होंने बचपन में अपने बच्चों को गोद में लेकर कहा था की कभी भी कुछ मत छुपाना हम है ना सब संभाल लेंगे)
ये कहानी अभी यहाँ खत्म नही हुई है बस शुरू हुई है जिसकी शुरुआत उसकी पढाई में रोड़े से होती है बड़ी मुश्किल से एडमिशन करवाते है फिर हर वक़्त जासूसी उसको ज़लील करते है उसपे शक करते है कभी-कभी अगर वो कही जाने की बात कह दे तो मना कर देते है मुह खोल के जैसे गुनाह उसने किया हो और वो कुछ झेली ना हो उसका दिल तो सख्त है कभी दर्द थोड़ी ना होता है अब तक भूल भी गई होगी तो चलो उसे याद दिला दे की उसने गुनाह कर रखा है उसे हर वक़्त सजा देते रहे अगर वो मानसिक तौर पे इससे निकलना चाहे तो उसे घसीट के वापस ले आए भूलने मत दे की उसने गुनाह किया है।
अब तो मैं भी मानती हु की उसने उसने गुनाह किया है अपने घर पर बता कर ............ उसने गुनाह किया है बचपन की सीख को मान कर ........ उसने गुनाह किया है अच्छा बन कर .......!!!!!!!
माँ-बाप को अपबे बच्चों के इस कदम की सराहना करनी चाहिए ना की सीन पलट देना चाहिए ....... उस पर विश्वास करना चाहिए न की उससे मेहनत करवानी चाहिए विश्वास को इक्कठा करने में ........ बच्चे है वो आपके सच बता रहे है इसका आकलन करे अभी और बेहतर भविष्य के लिए...............
कितना बुरा था मेरा अच्छा होना
ये सोच की अदालतों ने जता दिया"
कभी -कभी ज़िन्दगी में ऐसे मौके आते है जब आप अच्छे होते हुए भी बेहद बुरे हो जाते है ,शायाद गलती अच्छे बनने की कोशिश से ही शुरू होती है और ये गुन्नाह तब बनती है जब आप पूरी तरह अच्छे बन चुके होते है।
यु तो माँ-बाप अपने बच्चों को बचपन से ये सीख देते रहते है की 'बेटा ज़िन्दगी में कभी भी कुछ भी हो जाए हमसे कुछ छुपाना मत सब बता देना सच-सच हम तुम्हारे माँ-बाप है सब संभाल लेंगे ' ये बात अपने माँ-बाप से सब ही ने सुनी होगी ......मैंने भी सुनी है ।
पर इसपे जब बच्चे अमल करते है तो ये बुराई या गुस्से का पात्र क्यों बन जाती है ? अगर मैं अपने पिता को बताती हु की मुझसे कोई गलती हुई है तो इसे समझना क्यों इतना बुरा है उनके लिए और अगर बुरा है तो बचपन में उन्होंने ऐसा क्यों कहा था की ' सब बताना मैं हु ना'
वैसे तो इतनी हिम्मत किसी में नही की जिस किसी से प्यार किया हो
उसे अपने घर वालो के सामने बताना की 'मैं इससे प्यार करती हु पर अभी हम एक दूसरे को सिर्फ अपने परिवारो से मिलवाना चाहते है अपने करियर को बनाने के बाद ही कोई फैसला लेंगे पर ये रिश्ता आप सब के सामने लाना चाहते है बिना कुछ छुपाए " मान लेते है की ऐसे कहने की हिम्मत कोई लड़की कर भी ले तो क्या होगा???.....
सीन पलट जाएगा.....!!!!! समझदारी से किया हुआ काम दुस्साहस में बदल जाएगा ......,माँ का ब्लड प्रेशर लो या हाई हो जाएगा......., भाई का दिमाग जल उठेगा .........., और ये सब देख के लड़की की जो हालत हो गई होगी वो बाप को नौटंकी लगने लगेगी ,दोनों को अपने घर में ज़िल्लत भरी निगाहो से देखा जाएगा जैसे उन्होंने ये गुनाह आखिर कर कैसे दिया इतना घटिया काम तो कभी किसी ने नही किया इन लोगो को तो मार देना चाहिए पर क्या करे अपने ही बच्चे है । ये तो हम है जो माफ़ कर दिया कोई और होता तो कब का गला काट के फेक दिया होता ( और मैं आपको याद दिल दू ये वही माँ-बाप है जिन्होंने बचपन में अपने बच्चों को गोद में लेकर कहा था की कभी भी कुछ मत छुपाना हम है ना सब संभाल लेंगे)
ये कहानी अभी यहाँ खत्म नही हुई है बस शुरू हुई है जिसकी शुरुआत उसकी पढाई में रोड़े से होती है बड़ी मुश्किल से एडमिशन करवाते है फिर हर वक़्त जासूसी उसको ज़लील करते है उसपे शक करते है कभी-कभी अगर वो कही जाने की बात कह दे तो मना कर देते है मुह खोल के जैसे गुनाह उसने किया हो और वो कुछ झेली ना हो उसका दिल तो सख्त है कभी दर्द थोड़ी ना होता है अब तक भूल भी गई होगी तो चलो उसे याद दिला दे की उसने गुनाह कर रखा है उसे हर वक़्त सजा देते रहे अगर वो मानसिक तौर पे इससे निकलना चाहे तो उसे घसीट के वापस ले आए भूलने मत दे की उसने गुनाह किया है।
अब तो मैं भी मानती हु की उसने उसने गुनाह किया है अपने घर पर बता कर ............ उसने गुनाह किया है बचपन की सीख को मान कर ........ उसने गुनाह किया है अच्छा बन कर .......!!!!!!!
माँ-बाप को अपबे बच्चों के इस कदम की सराहना करनी चाहिए ना की सीन पलट देना चाहिए ....... उस पर विश्वास करना चाहिए न की उससे मेहनत करवानी चाहिए विश्वास को इक्कठा करने में ........ बच्चे है वो आपके सच बता रहे है इसका आकलन करे अभी और बेहतर भविष्य के लिए...............
