Friday, 20 November 2015

हाँ! मैं हूँ स्वार्थी


क्या यार स्वार्थी शब्द के अर्थ का अनर्थ कर रखा है दुनिया ने.....इतने विद्वान् आए पर कोई इस अनर्थ का अर्थ नही बना पाया..... लोग कहते है स्वार्थी होना बुरी बात है.......मुझे भी बचपन से यही कहा गया है , पर मैं हूँ स्वार्थी और रहूंगी - अच्छा रहेगा अगर आप भी मुझसे स्वार्थी बन कर बात करे और मुझे भी वही समझे......अरे मुझे तो स्वार्थी लोग ही पसंद है,क्योंकि स्वार्थी शब्द का मतलब है जो सिर्फ खुद से मतलब रखता हो,जिसे सिर्फ अपनी पड़ी हो.....तो इसमें बुराई क्या है। अब मेरा ही उदाहरण ले लीजिये , मैं एक पत्रकार बनना चाहती हूँ , मैं इस समाज से बुराई को ख़त्म करना चाहती हूँ ,क्योंकि मैं खुद इसी समाज में रहती हूँ, तो इसको कैसे गन्दा रहने दूँ, अब हुई न मैं स्वार्थी.....
जब कोई अपने माँ-बाप की सेवा करता है, तो वो उनसे आशीर्वाद पाना चाहता है, अब वो इंसान भी तो स्वार्थी ही हुआ। असल में हमे स्वार्थियों की ही ज़रूरत है, जो इस समाज को दुनिया को अपना समझे और पुरे स्वार्थ के साथ खुद को इसका हिस्सा समझ कर सुधार करे। मसलन जब कोई व्यक्ति किसी और से प्यार करता है ,उस वक़्त वो भी स्वार्थी ही होता है। आप अपने प्यार के साथ समय बिताना चाहते है क्योंकि जब वो व्यक्ति आपकी नज़रो के सामने होता है तो आप खुश होते है। आप उनको परेशान नही करते क्योंकि उनको परेशान देख आप भी असहज हो जाते है ,तो हुए न आप भी स्वार्थी....
क्या बुराई है इस शब्द में 
'ये दुनिया मेरी, ये समाज मेरा
ये सरकार मेरी, तो ये सरोकार भी मेरा'
जिस दिन हर एक व्यक्ति ऐसा 'स्वार्थी' बन जाए। उस दिन ये दुनिया कई लांछनों से बच जाएगी।
इस बात में कोई दो राय नही है की कुछ बुरे स्वार्थी होते है,तो कुछ भले... जैसे सिक्के के दो पहलु होते है वैसे हर चीज़ की दो किस्मे होती है। ये बताने की बिलकुल ज़रूरत नही है की किस किस्म के स्वार्थियों की ज़रूरत है इस दुनिया को। जैसे दुनिया के लोग निस्वार्थ भाव की बात करते है...वो तो बिलकुल जायज़ नही है,क्योंकि अगर एक इंसान अपने कार्य से प्यार नही करेगा  तात्पर्य उसे लेकर स्वार्थी नही होगा,तब तक पुरे मन से काम नही करेगा। तनमयता तभी आएगी जब स्वार्थ होगा,तो स्वार्थी बनिये इस दुनिया के लिए और गर्व से कहिये  'हाँ मैं हूँ स्वार्थी'।
जय हिन्द।

Thursday, 19 November 2015

पंचायती मेट्रो


कोई बड़ा शहर हो या छोटा शहर मेट्रो की रट सब जगह ही लग रही है। हर शहर अपने-अपने ट्रैफिक से इतना परेशान है की मेट्रो की फैन मचाए बैठा है, ऐसे में सरकारे भी सोच रही है इस हल्ले को कम करने के लिए मेट्रो नाम की चुसनी शहरवासियों के मुँह में ठूस के रखो । कभी न कभी मेट्रो आ ही जाएगी इस ख्याल से सब खुश है।
         अच्छा मैंने ये सुना है , मेट्रो का पहला डब्बा महिलाओ के लिए आरक्षित होता है, तो वहा खूब बातें होती होंगी और नए-नए किस्से भी सुनने को मिलते होंगे। इस उम्मीद में मैं जब दिल्ली गई ,महिला डिब्बे में सफ़र करने की सोची और अपने दांत चिंयार के डब्बे के अंदर पहुच भी गए.......पर वहा का समीकरण तो बिलकुल ही उल्टा निकला , न तो कोई आपस में बातचीत करता है, न ही एक दूसरे को कोई भली तरह देखता ही है, अगर किसी से नज़रे मिल जाए तो मुस्कुराना भी कोई उचित नही समझता, ऐसे हालात और लेडीज डिब्बे के। बड़ी निराश हुई ....हमे तो लगा था जैसे पहले के समय में सर्दियो की दोपहर को धुप खाने के लिए औरते छतों पे या अपने घर के  द्वारे  पे खटाई डाल के बैठ करती थी, अचार की खाने की रेसिपी  एक दूसरे को बताया करती थी, ऊन की सिलाई से बातो का स्वेटर बुना करती थी,महंगाई की उलझनों से मटर छिला करती थी, सब्जिया काटी जाती थी, पूजा पाठ की तिथि, गाना बजाना, मूंगफली खाना ये सब हुआ करता था, वैसा ही कुछ मेट्रो के लेडीज डब्बे में होता होगा, पर यहाँ तो किसीको मुस्कुराने तक का भी समय नही है।
वो ज़माना तो अब का युवा वर्ग न देख सका  पर अब लगता है ये पंचायती चौपाल इतिहास बनकर रह जाएगी शायद मेट्रो का सफ़र काफी छोटा है इतना छोटा की अचार तो छोड़ो इतने में हल्दी भी न पक पाए ।
शायद दिल्ली बहुत बड़ा शहर है , जब मेट्रो किसी छोटे शहर आएगी,तब देखते है कितनी कहानिया बनेगी ,कितने सीरियल या उनकी कहानियो की चर्चा हुआ करेगी, अपनी अपनी जीवन समस्याए और उनका निवारण मिला करेगा , या ये सब न भी हो तो कमसे कम एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने की प्रथा तो चलेगी ही चलेगी ये रिवायत तो कोई नही छीन सकता।  जय हिन्द।