आगरा का ताजमहल तो सब देखना चाहते है पर हर कोई देख पाता है क्या??.......
जी नही जनाब ये इंडिया है यहाँ हर किसी के नसीब में इतनी खूबसूरती को देख पाना आसान नही होता।
तो ऐसे में किया क्या जाए!!!.........क्या आपको पता है??....नही ना.....मैं बताती हु ।....क्यों न खुद ही ताजमहल में रहा जाए ।
अरे ! नही समझे ...अरे भाई अपने ही घर को ताजमहल बनाया जाए । अब आप सोच रहे होंगे की ये क्या बकवास कर रही है । पर सच बोलू तो यही एक तरीका है । जब भी कोई मिडिल क्लास आदमी घर बनवाता है तो वो ये चाहता है की कम से कम पैसे में उसे अपना घर ताजमहल जैसा दिखे......और कोशिश भी करता है । पहले बड़ी दूकान पे जाके अव्वल दर्जे का रंग ढूंढता है सेल्समेन का दिमाग खाता है फिर पूरी बात समझ लेने के बाद मना कर देता है बाहर निकल कर छोटी दूकान पे जाता है और वही सामान सस्ते में ले लेता है लेते वक़्त उसके चेहरे की ख़ुशी वैसे ही होती है जैसे की ताजमहल का टिकट ले रहा हो । ये सिर्फ रंगो की दुनिया ही नही है जहा वो श्वेत रंग का घर देखता है ये वो सपना भी है जो उसे उस खूबसूरती का एहसास दिलाता है जो अभी हाल ही में ओबामा न ले सके..........
वैसे एक बात और भी है जब कोई इंसान अपना घर बनाता है या बनवाता है तो वो ये भी चाहता है की इस घर को सिर्फ मैं ही ना सराहूं बल्कि मेरे नाते रिश्तेदार ,दोस्त सब ही सराहे पर ऐसा होता नही है .........क्योंकि टाइम नही तारीफ करने का ताज महल की तारीफ तो इसलिए होती है क्योंकि उसे दुनिया ने माना है तो कोई ऐसे कैसे बोल दे की "ठीक ठाक सा है कुछ ख़ास नहीं" पर किसी के घर की तारीफ़ कैसे करे उसे दुनिया ने थोड़े ही ख़ूबसूरत माना है ।
अब इस बात से दो बाते निकलती है एक तो ये है की ज़रूररी है की कोई चीज़ जो आपकी है , उस पर आपने पैसा लगाया है तो उसे कोई और ख़ूबसूरत कहे तो ही ख़ूबसूरत है वरना नही । अरे ! आपको लगता है तो वो आपका ताज महल है और यकीन मानिए वो आगरा वाले से भी कही गुना सुन्दर है । अब बारी दूसरी बात की करते है की अगर आपके सामने कोई अपने घर की व्याख्या कर रहा है तो कृपया थोड़ी देर मोबाइल को नीचे रख कर उसकी बात को सुनले आखिर उसने पैसे लगाए है उसकी तारीफ़ कर दे !!!
'बस ये करने को न कहो'
ये डायलाग चिपकने की न सोचियेगा .,,,,......
अच्छा चलिए मोबाइल पकडे-पकडे तारीफ कर दीजिये क्योंकि कभी आप भी अपना घर बनवाएंगे ,यु ही सपने सजाएंगे , पैसे पानी की तरह बहाएंगे .......एक-एक कोने में चमक को देखेंगे चाहे उस आधे बने घर या कहे दीवारो में रौशनी न हो चमक न हो सामान पड़ा हो पर फिर भी वो क्या कहते है .......हां.....खयाली पुलाव मसाला ठोक के पकाएंगे की यहाँ मैं वो तस्वीर लगाउँगा जो बचपन की लाल कपड़ो में है और यहाँ वो वाला लैंप शेड लगाउँगा जो मम्मी पाप की अनिवरसरी में ताई ने दी थी और व्याख्या भी कर रहे होंगे की जब यहाँ रंग होगा तो वो ऐसा होगा तो कितना अच्छा लगेगा .......और करे भी क्यों न आखिर घर भी तो ताज महल ही होता है।............!!!!
जी नही जनाब ये इंडिया है यहाँ हर किसी के नसीब में इतनी खूबसूरती को देख पाना आसान नही होता।
तो ऐसे में किया क्या जाए!!!.........क्या आपको पता है??....नही ना.....मैं बताती हु ।....क्यों न खुद ही ताजमहल में रहा जाए ।
अरे ! नही समझे ...अरे भाई अपने ही घर को ताजमहल बनाया जाए । अब आप सोच रहे होंगे की ये क्या बकवास कर रही है । पर सच बोलू तो यही एक तरीका है । जब भी कोई मिडिल क्लास आदमी घर बनवाता है तो वो ये चाहता है की कम से कम पैसे में उसे अपना घर ताजमहल जैसा दिखे......और कोशिश भी करता है । पहले बड़ी दूकान पे जाके अव्वल दर्जे का रंग ढूंढता है सेल्समेन का दिमाग खाता है फिर पूरी बात समझ लेने के बाद मना कर देता है बाहर निकल कर छोटी दूकान पे जाता है और वही सामान सस्ते में ले लेता है लेते वक़्त उसके चेहरे की ख़ुशी वैसे ही होती है जैसे की ताजमहल का टिकट ले रहा हो । ये सिर्फ रंगो की दुनिया ही नही है जहा वो श्वेत रंग का घर देखता है ये वो सपना भी है जो उसे उस खूबसूरती का एहसास दिलाता है जो अभी हाल ही में ओबामा न ले सके..........
वैसे एक बात और भी है जब कोई इंसान अपना घर बनाता है या बनवाता है तो वो ये भी चाहता है की इस घर को सिर्फ मैं ही ना सराहूं बल्कि मेरे नाते रिश्तेदार ,दोस्त सब ही सराहे पर ऐसा होता नही है .........क्योंकि टाइम नही तारीफ करने का ताज महल की तारीफ तो इसलिए होती है क्योंकि उसे दुनिया ने माना है तो कोई ऐसे कैसे बोल दे की "ठीक ठाक सा है कुछ ख़ास नहीं" पर किसी के घर की तारीफ़ कैसे करे उसे दुनिया ने थोड़े ही ख़ूबसूरत माना है ।
अब इस बात से दो बाते निकलती है एक तो ये है की ज़रूररी है की कोई चीज़ जो आपकी है , उस पर आपने पैसा लगाया है तो उसे कोई और ख़ूबसूरत कहे तो ही ख़ूबसूरत है वरना नही । अरे ! आपको लगता है तो वो आपका ताज महल है और यकीन मानिए वो आगरा वाले से भी कही गुना सुन्दर है । अब बारी दूसरी बात की करते है की अगर आपके सामने कोई अपने घर की व्याख्या कर रहा है तो कृपया थोड़ी देर मोबाइल को नीचे रख कर उसकी बात को सुनले आखिर उसने पैसे लगाए है उसकी तारीफ़ कर दे !!!
'बस ये करने को न कहो'
ये डायलाग चिपकने की न सोचियेगा .,,,,......
अच्छा चलिए मोबाइल पकडे-पकडे तारीफ कर दीजिये क्योंकि कभी आप भी अपना घर बनवाएंगे ,यु ही सपने सजाएंगे , पैसे पानी की तरह बहाएंगे .......एक-एक कोने में चमक को देखेंगे चाहे उस आधे बने घर या कहे दीवारो में रौशनी न हो चमक न हो सामान पड़ा हो पर फिर भी वो क्या कहते है .......हां.....खयाली पुलाव मसाला ठोक के पकाएंगे की यहाँ मैं वो तस्वीर लगाउँगा जो बचपन की लाल कपड़ो में है और यहाँ वो वाला लैंप शेड लगाउँगा जो मम्मी पाप की अनिवरसरी में ताई ने दी थी और व्याख्या भी कर रहे होंगे की जब यहाँ रंग होगा तो वो ऐसा होगा तो कितना अच्छा लगेगा .......और करे भी क्यों न आखिर घर भी तो ताज महल ही होता है।............!!!!
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