Saturday, 7 March 2015

ज़िन्दगी में मैंने कही सुनी बातो का भरोसा नही किया ....., चीज़ों को खुद समझ फिर फैसला किया .....,

बिंदास, बेबाख़ और सरलता से परिपूर्ण कुसुम शास्त्री सहनशील और खुद पर निर्भर रहने वालो में से एक है ।..., इन्हें अपनी ज़िन्दगी में अपने माँ-बाप और बचपन के दोस्तों पे पूरा भरोसा है । पेश है इनसे बात-चीत के कुछ अंश।

बचपन से आज तक कितने नामो से जानी गई है आप ?
मेरे वैसे तो बहुत नाम रहे है । प्यार से लोग मेरे कई नाम रख चुके है। पर फिलहाल तीन है कुसुम, ख़ुशी और कुक्कु(ये मेरे दोस्तों ने रखा है)

आपका घर कहा है ?
सोनभद्र
लखनऊ में दीदी-जीजा जी रहते है पर में पि.जी में रहती हु।

लखनऊ के बारे में आपका क्या ख़याल है?
ये काफी शांतिपूर्ण जगह है पर मेरे घर सोनभद्र जितना नही यहाँ का खाना मुझे पसंद है । मेंने टुंडे के कवाब खाए है और मुझे पसंद भी आए है ।

आपकी सेहत का राज़ क्या है?
में फूडी हु । इससे ज़्यादा और कुछ नही ।

खाना बनाने में आपकी कोई खासियत?
हाँ बिलकुल लोग कहते है "आई एम आ गुड कूक"

मास कॉम्युनिकेशन जैसे कोर्स का चुनाव क्यों किया ?
स्क्रिप्ट राइटिंग एक कारण है ।पहले में रोज़ डायरी लिखती थी अपनी दिनचर्या पर अब टाइम नही मिलता है तो जो भी बात दिमाग में आती है उसे अपने दिन का पंद्रह मिनट दे देती हु । अब ज़्यादातर कविताए लिखती हु । इसके इलावा अब advertisement  और पि.आर की फील्ड भी अच्छी लग रही है।

अभी आपने स्वाइन-फ्लू पे नुक्कड़ नाटक किया था ,इससे पहले आपने कोई प्ले किया है या कोई रुझान रहा है?
रुझान पहले से नहीं है पर अब धीरे-धीरे आ रहा है । स्कूल के समय मैंने आशाए( ओटिस्टिक्स) पे प्ले किया था और साक्षर में (डब्बा ब्रेन) पर भी कर चुकी हु।


लखनऊ विश्वविद्यालय से डिग्री लेने का निर्णय सही लगता है या गलत ?
मास कॉम्युनिकेशन में आपके अन्दर टैलेंट ज़रूरी होता है डिग्री नही  । किसी भी बड़े कॉलेज से मास कॉम का कोई फायदा नही अगर टैलेंट नही है ।

इस बदनाम यूनिवर्सिटी के किस्से सुनने के बावजूद यहाँ आने का होसला कैसे आया? 
ज़िन्दगी में मैंने कभी कही सुनी बातो पे भरोसा नही किया ....खुद समझा और फैसला किया

मास कॉम्युनिकेशन डिपार्टमेंट से कोई शिकायत ?
प्रक्टिकल कम होते है यहाँ ।जो हुमलोग करते है बस वही होता है ।डिपार्टमेंट से कोई बढ़ावा नही है पर अब फिर भी शुरू हो गया है और सीट्स काफी छोटी है इनको बदलने के बारे में सोचे ।

अपने सेहपाठियो में किसी के बारे में कुछ कहना चाहती है ऐसे जो आपके दोस्त न हो ?
वैसे तो में सबको जानती नही हु  पर जितनो को जानती हु वो सब अच्छे है असल में छः महिने में किसी के बारे में कोई राय कैसे बनाऊ? हाँ अंजलि ,वैशाली,सौम्य,और अर्पित से मेरी अच्छी बनती है।

ज़िन्दगी से क्या उमीदे है ?
अच्छी जॉब और सफल करियर

फैमिली ज़्यादा ज़रूरी है या करियर ?
फैमिली , प्राइड,करियर,मनी  ये मेरी ज़िन्दगी में पहले से आखरी विशेषताए है ।मेरी फैमिली मुझे बहुत सपोर्ट करती है । आखिर ये कैरियर फैमिली के लिए ही तो है।

शोहरत के क्या मायने है आपकी ज़िन्दगी में?
ज़रूरी है शोहरत पर स्ट्रगल भी होता है तो एहमियत तो है पर ज़्यादा नही ।

अभी तक ज़िन्दगी में किसी ख़ास से कोई मुलाक़ात?
(हस्ते हुए) ये सवाल किस दिशा का है
(थोडा मुस्कुराकर) जी नही अअभी तक नही पर मुझे इस मुलाक़ात का इंतज़ार रहेगा ।
किसी से कोई नाराज़गी ज़िन्दगी में?
नहीं कोई नही मेरा मानना है की ज़िन्दगी में बुरी चीज़े होती है तो अच्छी भी होती है और में अच्छे पे ध्यान देती हु बुरे पे नही ।

न्यूज़ पेपर पढ़ती है आप ?
हाँ बहुत ....में पहला ,आखरी  पेज ज़रूर पड़ती हु इसके अलावा सिटी,एडिटोरियल,और इंटरनेशनल बहुत शौक से पढ़ती हु ।

अपने आदर्श के बारे में बताए?
मेरे पापा और राइटिंग में तसनीम नसरीन इनकी 'लज्जा' पढ़ी है मैंने और वैसे मैंने चेतन भगत के 2 स्टेट्स पढ़ी है ।

अगर  किस्मत ने आपको विदेश पंहुचा दिया तो जाएंगी?
हाँ ख़ुशी-ख़ुशी अपने नाम की तरह ।

स्पोर्ट्स में कोई इंटरेस्ट ?
हाँ क्रिकेट में जब इंडिया खेलती है तो मेरा ध्यान सिर्फ टी.वि में होता है ।

पॉलिटिक्स के बारे में आपके क्या विचार है ?
"आई हेट पॉलिटिक्स" कहने को यो ये नेता हमारे सेवक है पर ये 'डिवाइड न रूल' करते है । हमे अलग करते है । इसलिए मुझे नफरत है इनसे ।

अभी हाल ही में बनी केंद्र सरकार से खुश है आप?
बिलकुल नही ! आठ माह हो गए पर पर कुछ नही किया है सिवाए देखावे के।

अपने देश में ऐसे क्या खासियत है जो दुनिया के और देशो में नही है?
यहाँ बहुत सारे रंग है ,रौशनी है , ये उत्सवो का देश है यहाँ कोई दिन खाली नही है ।बस रूढ़िवादी सोच और नौकरशाही को अलग रखे तो सबसे अच्छा है अपना देश।

वरदान मिलने पर ज़िन्दगी में क्या बदलना पसंद करेंगी ?

मेरी ज़िन्दगी सही जा रही है बस इस देश की पॉलिटिक्स जरूर बदल दूंगी।

कल को अगर आपकी कारपोरेशन में कुछ गलत हो रहा हो तो क्या आप उनके खिलाफ जाएंगी?
जी बिलकुल जाउंगी ।

Monday, 2 March 2015

घर एक ताजमहल

आगरा का ताजमहल तो सब देखना चाहते है पर हर कोई देख पाता है क्या??.......
जी नही जनाब ये इंडिया है यहाँ हर किसी के नसीब में इतनी खूबसूरती को देख पाना आसान नही होता।
  तो ऐसे में किया क्या जाए!!!.........क्या आपको पता है??....नही ना.....मैं बताती हु ।....क्यों न खुद ही ताजमहल में रहा जाए ।
अरे ! नही समझे ...अरे भाई अपने ही घर को ताजमहल बनाया जाए । अब आप सोच रहे होंगे की ये क्या बकवास कर  रही है । पर सच बोलू तो यही एक तरीका है । जब भी कोई मिडिल क्लास आदमी घर बनवाता है तो वो ये चाहता है की कम से कम पैसे में उसे अपना घर ताजमहल जैसा दिखे......और कोशिश भी करता है । पहले बड़ी दूकान पे जाके अव्वल दर्जे का रंग ढूंढता है सेल्समेन का दिमाग खाता है फिर पूरी बात समझ लेने के बाद मना कर देता है बाहर निकल कर छोटी दूकान पे जाता है और वही सामान सस्ते में ले लेता है लेते वक़्त उसके चेहरे की ख़ुशी वैसे ही होती है जैसे की ताजमहल का टिकट ले रहा हो । ये सिर्फ रंगो की दुनिया ही नही है जहा वो श्वेत रंग का घर देखता है ये वो सपना भी है जो उसे उस खूबसूरती का एहसास दिलाता है जो अभी हाल ही में ओबामा न ले सके..........

                वैसे एक बात और भी है जब कोई इंसान अपना घर बनाता है या बनवाता है तो वो ये भी चाहता है की इस घर को सिर्फ मैं ही ना सराहूं बल्कि मेरे नाते रिश्तेदार ,दोस्त सब ही सराहे पर ऐसा होता नही है .........क्योंकि टाइम नही तारीफ करने का ताज महल की तारीफ तो इसलिए होती है क्योंकि उसे दुनिया ने माना  है तो कोई ऐसे कैसे बोल दे की "ठीक ठाक सा है कुछ ख़ास नहीं" पर किसी के घर की तारीफ़ कैसे करे उसे दुनिया ने थोड़े ही ख़ूबसूरत माना है ।
               अब इस बात से दो बाते निकलती है एक तो ये है की ज़रूररी है की कोई चीज़ जो आपकी है , उस पर आपने पैसा लगाया है तो उसे कोई और ख़ूबसूरत कहे तो ही ख़ूबसूरत है वरना नही । अरे ! आपको लगता है तो वो आपका ताज महल है और यकीन मानिए वो आगरा वाले से भी कही गुना सुन्दर है । अब बारी दूसरी बात की करते है की अगर आपके सामने कोई अपने घर की व्याख्या कर रहा है तो कृपया थोड़ी देर मोबाइल को नीचे रख कर उसकी बात को सुनले आखिर उसने पैसे लगाए है उसकी तारीफ़ कर दे !!!
'बस ये  करने को न कहो'
ये डायलाग चिपकने की न सोचियेगा .,,,,......
अच्छा चलिए मोबाइल पकडे-पकडे तारीफ कर दीजिये क्योंकि कभी आप भी अपना घर बनवाएंगे ,यु ही सपने सजाएंगे , पैसे पानी की तरह बहाएंगे .......एक-एक कोने में चमक को देखेंगे चाहे उस आधे बने घर या कहे दीवारो में रौशनी न हो चमक न हो सामान पड़ा हो पर फिर भी वो क्या कहते है .......हां.....खयाली पुलाव मसाला ठोक के पकाएंगे की यहाँ मैं वो तस्वीर लगाउँगा जो बचपन की लाल कपड़ो में है और यहाँ वो वाला लैंप शेड लगाउँगा जो मम्मी पाप की अनिवरसरी में ताई ने दी थी और व्याख्या भी कर रहे होंगे की जब यहाँ रंग होगा तो वो ऐसा होगा तो कितना अच्छा लगेगा .......और करे भी क्यों न आखिर घर भी तो ताज महल ही होता है।............!!!!