Thursday, 14 April 2016

अब क्या लिखूँ

लिखते रहिये की लिखने की काबिलियत लेखनी के इतिहास में लेखको को अमर कर देती है।
पर रोज़-रोज़ ये कर पाना कहा तक संभव है, हर रोज़ की नई कशमकश और उनसे जूझते ख्याल मन को हिलाने का काम तो बड़ी आसानी से करते है पर उनको लिख के बयां करने का काम इतना आसान भी तो नही है।
हर रोज़ के इस झगडे का समाधान यही है कि बस लिखने बैठ जाओ, जो मन में आए , जहा तक ये कलम ले जाए ,उसके साथ जाओ ,कोशिश करो की आज लिखने का कोई मुद्दा न मिले न राजनीतिक, न खेलनीतिक ,सबकुछ आकस्मिक हो ,पूर्णतया खयालो से जुड़ा और जिस मुद्दे को लिखने बैठे हो वहा से भटको भी न।
हर बार ये दिमाग के घोड़े जब दौड़ते है तो अनंत तक जाते है , आज कलम के घोड़े मुझे ले जा रहे है तो वहा जाने का मन नही कर रहा ।
अमा अजब झगड़ा कर रखा है तुम लोगो ने .....
आज जिन मसलो पर तुम बात करना चाहते तो उनपे ये लिखने को तैयार नहीं, जिन मसलो पर ये लिखने को तैयार है उनपे तुम सोचने को तैयार नहीं, फैसला क्यों नही कर लेते तुमदोनों की आखिर बात क्या है।
हर किसी के अंदर रोज़ यही झगडे होते हैं। इस बीच एक लेखक खो सा गया है, मुझे उम्मीद है ये इसी स्याही में दब के मर भी जाएगा और स्याही का गहरा नीला रंग ऊपर से लेखक की लाश को पहचान में भी नही आने देगा ,बिना 3 फ़ीट का गड्ढा किया एक लेखक दब-दब कर अपने आपको दफ़न कर लेगा
आज के लिए इतना लिखना बहुत है।
जय हिन्द।